जगतजननी माँ का दिव्य निवास

मणिद्वीप का निर्माण

जगतजननी माँ ने युगप्रवर्तन का सूत्रपात करने हेतु भैया जी को चक्र धारण करवाया। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु माँ ने अपने बच्चों के लिए एक भवन के निर्माण का प्रबन्ध पहले से ही सुनिश्चित कर रखा था — वह भवन आगे चलकर ‘मणिद्वीप’ के नाम से जाना गया।

1991 · एक कल्पनातीत वचन

बंगले का वचन

मणिद्वीप भवन का वर्तमान स्वरूप
आज मणिद्वीप, शास्त्री नगर, जोधपुर

समस्त सृष्टि का संचालन करने वाली जगतजननी माँ ने रामेश्वर धाम की यात्रा से लौटने के बाद सन् 1991 में माँ बसन्ती जी को दर्शन देकर कहा — “मैंने तेरे लिए बंगला बना दिया है।” यह एक कल्पनातीत बात थी। माँ बसन्ती जी तो स्वप्न में भी अपनी साधनास्थली — जहाँ उन्होंने वर्षों गहन साधना की थी — को छोड़कर कहीं और निवास करने की बात सोच भी नहीं सकती थीं। परन्तु अब उन्होंने भी स्थानांतरण का मानस बना लिया और ‘माँ’ की आज्ञा का पालन किया।

‘माँ’ की आज्ञानुसार शास्त्री नगर में स्थान की खोज शुरू हुई। ए-183 भूखण्ड भैया जी और माँ बसन्ती जी को पसन्द आया; माँ बसन्ती जी ने वहाँ ध्यान लगाकर अपनी सहमति की मोहर लगा दी और कीमत भी तय हो गई। परन्तु अगले ही दिन भूखण्ड के मालिक तय कीमत से अधिक की माँग करने लगे।

“अगर जगतजननी माँ को यही स्थान पसन्द है, तो मकान मालिक पहले तय की गई कीमत पर ही हमें यह स्थान उपलब्ध करवाएगा।”
माँ बसन्ती जी

इस बात को लगभग एक वर्ष बीत गया। दीपावली के शुभ अवसर के दूसरे ही दिन भूखण्ड का मालिक स्वयं आया और पूरे ‘माँ परिवार’ को आश्चर्यचकित करते हुए, एक वर्ष पूर्व तय हुई राशि पर ही वही भूखण्ड देने के लिए तैयार हो गया — “मुझे आपको पहले तय की गई कीमत पर ही यह स्थान देना है।”

भूखण्ड की विशेषता

दो आम के वृक्षों वाला भूखण्ड

मणिद्वीप भवन के साथ खड़े आम के वृक्ष
भूखण्ड की सबसे बड़ी विशेषता — साथ खड़े दो आम के वृक्ष

इस भूखण्ड की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ एक साथ दो आम के वृक्ष लगे थे। मान्यता है कि आम के वृक्षों के ऐसे ही जोड़े के नीचे भगवान शिव और माँ पार्वती का विवाह हुआ था।

जब इस भूखण्ड का सौदा हुआ, तब इसका नाम ‘पवित्र-निवास’ था। भैया जी और माँ बसन्ती जी ने सोचा कि यही नाम आगे भी रखा जाएगा।

1993 · माँ की आज्ञा

‘पवित्र-निवास’ से ‘मणिद्वीप’ तक

मणिद्वीप भवन पर अंकित नाम-पट्ट
भवन के मुख्य द्वार पर अंकित ‘मणि द्वीप’

सन् 1993 में जब भवन का निर्माण-कार्य आरम्भ हुआ, तब माँ बसन्ती जी को ध्यान में दृष्टान्त हुआ कि इस बंगले का नाम ‘मणिद्वीप’ रखा जाए। उन्होंने जब यह बात भैया जी को बताई, तो भैया जी ने पूछा — “जहाँ भगवान शिव-बाबूजी रहते हैं, उस लोक का क्या नाम है?” उत्तर मिला — “कैलाश लोक।” फिर पूछा, भगवान विष्णु के लोक का नाम? माँ बसन्ती जी ने कहा — “वैकुण्ठ।” पुनः पूछा — “माँ त्रिपुरसुन्दरी के लोक का क्या नाम है?” इस पर माँ बसन्ती जी ने कहा — “मुझे ज्ञात नहीं, पर जहाँ मैं रहती हूँ, वहीं मेरी माँ रहती हैं।” तब भैया जी ने बताया कि ‘माँ’ के लोक का नाम ‘मणिद्वीप’ है, इसलिए ‘माँ’ ने ही ‘मणिद्वीप’ नामकरण का आदेश दिया है।

तब माँ बसन्ती जी ने जगतजननी माँ से पूछा — “द्वीप क्यों? द्वीप तो वह होता है जिसके चारों ओर पानी ही पानी होता है।” ‘माँ’ ने कहा — “संसार को क्या कहते हैं?” माँ बसन्ती जी ने उत्तर दिया — “भवसागर।” तब ‘माँ’ ने कहा — “जिसे भी इस संसार-रूपी भवसागर से पार उतरना है, वह इस ‘मणिद्वीप’ में शरण ले ले।” इस प्रकार इस स्थान का नाम ‘पवित्र-निवास’ से बदलकर ‘मणिद्वीप’ रखा गया। ‘मणिद्वीप’ चैतन्य जगत् में जगतजननी माँ का लोक है; अतः धरती पर ‘मणिद्वीप’, माँ के उसी लोक का प्रतीक है। मनिहारों की हवेली से ‘मणिद्वीप’ में 10 जून 1995 को ‘माँ परिवार’ स्थानांतरित हो गया।

अनुभूति

कण-कण में फैली आध्यात्मिक ऊर्जा

मणिद्वीप के भीतर एक साधना-कक्ष
शांत चित्त से बैठते ही यहाँ आनन्द और शांति का संचार होने लगता है

‘मणिद्वीप’ एक ऐसा अलौकिक स्थान है जहाँ कण-कण में आध्यात्मिक ऊर्जा फैली हुई है। अन्दर प्रविष्ट होते ही आनन्द की अनुभूति होने लगती है और ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी दिव्य स्थान पर आ गए हों तथा मन में शांति अनुभव होती है। यहाँ नकारात्मक सोच स्वतः ही समाप्त हो जाती है और व्यक्ति सकारात्मक सोच से ओतप्रोत हो जाता है। यहाँ निरन्तर आते रहने से कई लोगों में चमत्कारिक परिवर्तन हुए हैं — मानवीय संवेदना, करुणा, संयम और प्रेम का संचार हुआ है। ‘माँ’ के वात्सल्य से परिपूर्ण ‘मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ के सदस्यों में आत्मीयता, प्रेम, सहिष्णुता और पारस्परिक आदर-सम्मान की भावना दिनों-दिन प्रगाढ़ होती जा रही है, जो आज के भौतिक प्रतिस्पर्धापूर्ण युग में दुर्लभ है। इसीलिए यहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का उदय होता है।

‘मणिद्वीप’ एक कल्पवृक्ष के समान है। मान्यता है कि कल्पवृक्ष के नीचे सभी इच्छित मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यहाँ आकर व्यक्ति के सारे शक-सन्देह, अहंकार और आसक्ति जैसे अवगुण धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। भैया जी के ज्ञान को धारण करने से नकारात्मक सोच और दोष दूर होने लगते हैं — मानो अमृतकुण्ड से निकलकर मैली कम्बल पूर्णतः शुद्ध हो गई हो। इसके पश्चात् व्यक्ति को जीवन जीने की कला का ज्ञान होता है; वह प्रेम, सुख, आनन्द और शांति से जीवन जीने लगता है, और उसमें आध्यात्मिक साधना के प्रति जिज्ञासा जागृत हो जाती है। मार्गदर्शक के अनुसार चलने से साधना फलीभूत होने लगती है, भीतर दिव्य चेतना का प्रादुर्भाव होता है, और अन्ततः इष्टदेव की कृपा से आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति होती है — यही कल्पवृक्ष का सुफल है।

रहस्य

यह सब कैसे सम्भव है?

मणिद्वीप में साधनारत परिवारजन
यहाँ निरन्तर साधना का प्रवाह जारी है

यहाँ स्वयं जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी विराजती हैं। भैया जी और माँ बसन्ती जी ने अनेक स्थलों पर साधना कर जगतजननी माँ को प्रसन्न किया — वे सभी स्थल तपोभूमि बन गए और आज भी जाग्रत हैं। भैया जी और माँ बसन्ती जी जगतजननी माँ से प्रेम के बन्धन से बँधे हैं, और जहाँ सन्तान रहेगी, माँ भी पूर्ण वात्सल्य के साथ वहीं रहेंगी। ‘मणिद्वीप’ में माँ की आज्ञा से आने पर भैया और माँ बसन्ती जी के साथ माँ-बाबूजी एवं समस्त चैतन्य शक्तियाँ भी यहाँ प्रेम से विराजमान हो गईं। यहाँ उनकी तथा ‘माँ परिवार’ के अन्य सदस्यों की अनवरत साधना चल रही है, इसलिए यह स्थान सघन शक्तिपुंज है, दिव्य चैतन्यता से ओतप्रोत। सैकड़ों श्रद्धालु यहाँ आकर अपने जीवन का कल्याण कर रहे हैं।

‘मणिद्वीप’ की सभी घटनाएँ जगतजननी माँ की इच्छा से ही होती हैं, क्योंकि ‘मणिद्वीप’ उनका घर है और वे ही इसे संचालित करती हैं। यहाँ आरती भी तभी होती है जब जगतजननी माँ स्वयं यहाँ पधारती हैं। यह अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, परन्तु सत्य है।
यहीं से आगे बढ़ी सेवा

सेवा की चार धाराएँ

‘मणिद्वीप’ केवल साधना का ही केन्द्र नहीं बना — यहीं से निष्काम कर्म साधना की चार सेवा-धाराएँ भी प्रवाहित हुईं: बालिका शिक्षा के लिए स्वामी विवेकानन्द ट्रस्ट एवं माँ शारदामणि ट्रस्ट, बालक शिक्षा व समग्र सेवा के लिए ज्ञानयोगी अध्यात्म केन्द्र, और सद्साहित्य के प्रकाशन-वितरण के लिए ज्ञान गंगा मिशन। भैया जी द्वारा रोपा गया यह बीज माँ बसन्ती जी और मधु माँ के नेतृत्व में आज एक विशाल सेवा-वटवृक्ष का रूप ले चुका है।

आज भी जाग्रत

मणिद्वीप आज भी साधकों को अपनी छाँव में बुलाता है

यह न केवल भैया जी और माँ बसन्ती जी का निवास रहा, बल्कि आज भी हजारों साधकों के लिए शांति, दिशा और दिव्य अनुभूति का स्रोत है।