श्री नन्दकिशोर शारदा, वात्सल्यमयी माँ बसन्ती मनिहार एवं कुमारी मधुबाला अडवानी के समस्त सेवा-कार्य जगत्जननी माँ की आज्ञा एवं उनकी कर्म-साधना की व्यापक जीवन-दृष्टि से प्रेरित हैं। उनके लिए कर्म केवल दायित्व या सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि आत्म-विकास, आत्मशुद्धि और लोकमंगल की साधना है। इसीलिए इसके मूल में किसी आकस्मिक योजना की नहीं, बल्कि मानव के समग्र विकास की एक सुविचारित, दीर्घकालीन और दूरदर्शी दृष्टि रही।
उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक विकास केवल आर्थिक सहायता या औपचारिक शिक्षा से संभव नहीं है। जीवन में शिक्षा के साथ संस्कार, ज्ञान के साथ विवेक, समृद्धि के साथ संवेदना, आत्मनिर्भरता के साथ आत्मसम्मान और व्यक्तिगत उन्नति के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी उतना ही आवश्यक है।
अध्यात्म का सर्वोच्च स्वरूप सेवा में प्रकट होता है।
भैया जी की दृष्टि में निष्काम भाव से मानवता की सेवा, साधना का ही जीवंत विस्तार है। इसी भाव से शिक्षा, संस्कार, आध्यात्मिक जागरण, महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता और ज्ञान के प्रसार को एक-दूसरे से जोड़ा गया।
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