कर्तृत्व भाव से मुक्त कर्म
हर कार्य को माँ का कार्य मानकर उन्होंने अपना सर्वस्व दिव्य उद्देश्य में अर्पित किया।
भैया जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को माँ त्रिपुरसुन्दरी के कार्य, मानव कल्याण और परमार्थ में समर्पित कर दिया। उनके जीवन से ज्ञान, साधना, सेवा और विश्व-बन्धुत्व की ऐसी धारा प्रवाहित हुई जिसने इस युग में नई चेतना का सूत्रपात किया।
हर कार्य को माँ का कार्य मानकर उन्होंने अपना सर्वस्व दिव्य उद्देश्य में अर्पित किया।
माँ-प्रदत्त ज्ञान को सरल, व्यवहारिक और युगानुकूल रूप में जन-जन तक पहुँचाया।
शिक्षा, संस्कार, आत्मनिर्भरता और सेवा को अध्यात्म की जीवित अभिव्यक्ति बनाया।
दीप से दीप जलते गए और एक वैचारिक क्रान्ति का उदय हुआ।
भैया जी के बहुआयामी कार्यों को देखकर आश्चर्य होता है कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानव कल्याण और परमार्थ को कैसे समर्पित कर दिया। उन्होंने अपना सर्वस्व माँ त्रिपुरसुन्दरी को अर्पित कर दिया और प्रत्येक कार्य को माँ का कार्य माना।
इस पूर्ण समर्पण से उनका कर्तृत्व भाव समाप्त हुआ और वे कर्म-बन्धन से मुक्त हुए। उन्होंने अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उनके लिए अध्यात्म केवल निजी अनुभूति नहीं था; वह जीवन, समाज और मानवता को प्रकाश देने की साधना थी।
भैया जी का ज्ञान इतना व्यवहारिक और सरल है कि व्यक्ति आवश्यकतानुसार भौतिक सुख-सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी अध्यात्म कर सकता है। यह ज्ञान स्वयं जगत्जननी माँ-प्रदत्त है, इसलिए समय और काल से परे, सार्वभौमिक, सत्य, शाश्वत् और कालजयी है।
उनकी साधना पद्धति को हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय का व्यक्ति बिना किसी बंधन के सहज रूप से कर सकता है। जगत्जननी माँ को गुरु मानकर भैया जी ने दिव्य दृष्टि प्राप्त की और ब्रह्माण्ड की रचना के रहस्यों को समझा। उनके स्वानुभव पर आधारित दिव्य ग्रंथ मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार अध्यात्म के क्षेत्र में प्रेरणास्रोत बन रहा है।
इसके अध्ययन से साधकों में भौतिक आसक्ति, काम और क्रोध से मुक्ति तथा दिव्य चेतना के अनुभव की प्रेरणा जागती है। अनेक नास्तिकों ने भी इसे पढ़कर आस्तिकता की ओर कदम बढ़ाया।
भैया जी की हस्तलिखित डायरी, जिसे उन्होंने 12 वर्ष की किशोरावस्था से लिखना आरम्भ किया, उनकी साधना, आध्यात्मिक प्रगति, विचारों और कठिन परिस्थितियों से संघर्ष की सजीव गाथा है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जगत्जननी माँ के उनके साक्षात् दर्शन का वर्णन है।
यह उन साधकों के लिए आश्वस्ति और प्रेरणा है जो आज भी संदेह करते हैं कि क्या इस युग में माँ के दर्शन सम्भव हैं। डायरी यह विश्वास दृढ़ करती है कि निःस्वार्थ प्रेम, समर्पण और साधना से माँ की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
“माँ बसन्ती जी जब भावावस्था में होती थीं तब उनका सीधा सम्बन्ध जगत्जननी माँ से हो जाता था। एक बार वे धीरे-धीरे गुनगुना रही थीं, ‘भैया जैसा कोई नहीं’।”यह भाव जगत्जननी माँ की दिव्य वाणी के रूप में स्वीकार किया गया।
भैया जी के व्यक्तित्व में बचपन से ही त्याग, प्रेम और संवेदनशीलता विद्यमान थे। वे परदुःखकातर थे और दूसरों की सहायता के लिए अपने सुख-सुविधाओं का त्याग करने में भी पीछे नहीं हटते थे।
उनके पास आने वाला कोई व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। उन्होंने अनेक लोगों को रोजगार दिलाने, दुकानें स्थापित कराने और आवश्यक मशीनें उपलब्ध कराने में सहायता की ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। इस प्रकार उन्होंने सैकड़ों परिवारों को आर्थिक संबल प्रदान किया और स्वावलम्बन को सेवा का माध्यम बनाया।
बाल्यकाल से ही वे ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहाँ व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर अपनी आय का कुछ भाग दूसरों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में लगाए। उनकी दृष्टि में सम्पूर्ण वसुधरा एक विशाल परिवार थी।
स्वामी विवेकानन्द स्टूडेन्ट्स वेलफेयर चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से हजारों छात्राएँ शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना रही हैं और समाज के लिए प्रेरणा बन रही हैं। भैया जी द्वारा प्रतिपादित अध्यात्म और संस्कार के सिद्धान्तों को अपनाकर वे विवेकपूर्ण, जिम्मेदार नागरिक बन रही हैं।
भैया जी ने विद्यार्थियों में अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरूकता उत्पन्न की। उनके विचारों से प्रेरित होकर अनेक युवा सजग नागरिक बनकर राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वास्तव में, जिम्मेदार और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही राष्ट्र की सच्ची सम्पदा हैं।
भैया जी द्वारा प्रदत्त बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास में सहायक है। इसके अभ्यास से बुद्धि-विवेक निर्मल होते हैं, शरीर स्वस्थ रहता है, मन एकाग्र और चित्त शांत होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है तथा भय और तनाव कम होते हैं।
इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति व्यवसाय, नौकरी और शिक्षा सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। विद्यार्थियों में एकाग्रता और ज्ञान के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है। ईर्ष्या और राग-द्वेष कम होकर प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना विकसित होती है।
वाणी पर संयम से परिवार और कार्यक्षेत्र में सुख, शांति और सामंजस्य बढ़ता है। मतभेदों का समाधान संवाद और शांति से करने की क्षमता विकसित होती है। इस प्रकार यह साधना व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों का आत्मविश्वास और साहस के साथ सामना कर सफलता की ओर अग्रसर करती है।
श्री नन्दकिशोर शारदा भैया एक व्यक्ति नहीं, संस्था थे। मृदुभाषी, शांत, गंभीर, सौम्य और सरल व्यक्तित्व के धनी, उनका भौतिक अस्तित्व भी चैतन्यमय था। उनका जीवन पवित्र गंगा के निर्मल प्रवाह की तरह एक खुली किताब है।
नए युग का सूत्रपात हो चुका है। उन्होंने आज के युग की भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं के अनुरूप नई विचारधारा, नई पद्धति और नया ज्ञान दिया। इसके फलस्वरूप ऐसा अध्यात्म परिवार तैयार हुआ जो मानवीय गुणों को पुनः स्थापित करने के लिए कटिबद्ध और समर्पित है।
आज हजारों लोग भैया जी के बताए मार्ग पर चलकर अपने भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को अधिक आनन्दमय और सार्थक बना रहे हैं। दीप से दीप जल रहे हैं और एक वैचारिक क्रान्ति का उदय हो चुका है, जिसकी आभा समस्त विश्व में फैलने लगी है।
उन्होंने इस युग में नई चेतना का सूत्रपात किया, वसुधैव कुटुम्बकम् और विश्व-शांति की भावना को नई ऊर्जा दी, और मानव जाति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले गए। धरती माँ धन्य हुई ऐसे लाडले को पाकर।
“भैया जैसा कोई नहीं।”माँ बसन्ती जी की भावावस्था में उद्भूत यह वाणी भैया जी के युगप्रवर्तक स्वरूप की दिव्य पुष्टि मानी जाती है।