पाँचवीं रोड चौराहे से बारहवीं रोड चौराहे तक
भैया जी का जीवन सत्य की खोज, जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी के प्रति निष्काम प्रेम-समर्पण, दिव्य ज्ञान, निष्काम कर्म और मानव कल्याण की एक अद्वितीय आध्यात्मिक यात्रा है।
श्री नन्दकिशोर शारदा, जिन्हें सभी प्रेम से भैया कहते हैं, का जन्म 16 जुलाई 1944 को जोधपुर में तुलसी देवी और विजयकिशन जी शारदा के सम्पन्न तथा भक्तिमय परिवार में हुआ। वे विज्ञान के मेधावी छात्र थे और विलक्षण बुद्धि तथा तेजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी थे।
बाल्यावस्था से ही उनमें प्रश्न करने की गहरी प्रवृत्ति थी। उनकी दृष्टि केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन के मूल रहस्य को जानने की ओर निरंतर खिंचती गई।
सन् 1959 में, जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, उनके पिताजी के आकस्मिक देहावसान ने उन्हें भीतर तक विचलित कर दिया। उसी क्षण उन्हें भौतिक शरीर की नश्वरता का गहरा बोध हुआ।
उन्होंने दृढ़ संकल्प किया कि वे भौतिकवाद के आकर्षण और सुख-सुविधाओं में लिप्त नहीं होंगे। वे उस चैतन्य शक्ति की खोज करेंगे जो इस शरीर को चलायमान रखती है। मनुष्य जन्म का उद्देश्य क्या है, जीवन कैसे बिताना चाहिए, और यह शक्ति क्या है, ये प्रश्न उनकी साधना की धुरी बन गए।
भैया जी अनेक साधु-संतों, तांत्रिकों, मांत्रिकों और महात्माओं के पास गए, आध्यात्मिक और धार्मिक पुस्तकें पढ़ीं, पर उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिले। एक दिन जोधपुर के मेहरानगढ़ किले की घाटी में उन्हें टेकरी पर एक मंदिर दिखाई दिया। वहाँ उन्हें अद्भुत शांति मिली।
उन्होंने जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी की एकनिष्ठ आराधना दिन-रात व्याकुलता और विरह से की। माँ त्रिपुरसुन्दरी ने अपने लाडले भक्त की पुकार सुनी, उन्हें साक्षात् दर्शन दिए, और अपनी असीम शक्तियाँ प्रदान कीं। भैया और माँ एकमय हो गए।
भैया जी ने जगत्जननी माँ को गुरु बनाकर जो अमृततुल्य दिव्य ज्ञान प्राप्त किया, उसे उन्होंने विज्ञान से प्रारम्भ करते हुए विज्ञान की सीमाओं के परे ब्रह्माण्ड की संरचना, सृष्टि की उत्पत्ति, प्रकृति, दिव्य लोक, ईश्वर की सत्ता, मानव जीवन के लक्ष्य और चैतन्य शक्ति के महत्व तक विस्तृत किया।
यह दिव्य चिंतन “मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार” में प्रस्तुत हुआ। इस ग्रंथ को पढ़कर मनुष्य का ईश्वर और चैतन्य शक्ति पर श्रद्धा और विश्वास दृढ़ होता है। उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, हस्तलिखित डायरी, माँ के प्रति समर्पण और दार्शनिक विचारों का विस्तृत परिचय उनके जीवन-वृत्त और स्मृति ग्रंथों में मिलता है।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने निष्काम कर्म के अंतर्गत बालिकाओं की शिक्षा के लिए 1996 में स्थापित स्वामी विवेकानन्द स्टूडेन्ट्स वेलफेयर चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से हजारों छात्राओं को शिक्षा और संस्कार प्रदान किए।
इस कार्य ने अनेक जीवनों में आशा की किरण जगाई और उज्ज्वल भविष्य की राह प्रशस्त की। संसार में रहते हुए भी सांसारिक विकारों से अछूते रहकर उन्होंने अनवरत, अथक और निष्काम कार्य करते हुए स्थितप्रज्ञ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया।
भैया जी भक्ति योग, ज्ञान योग, निष्काम कर्मयोग और योग साधना, इन चारों कठिन साधनाओं में निष्णात हुए। उन्होंने देखा कि आज के युग में सामान्य व्यक्ति के लिए ये साधनाएँ अत्यंत कठिन प्रतीत होती हैं।
जनकल्याण हेतु उन्होंने इन साधनाओं का सरलीकरण और आवश्यक समावेश कर एक नई, सरल, सामयिक साधना पद्धति प्रतिपादित की, जिसका नाम है बुद्धि-विवेक योग साधना। भैया ने स्वयं अति कठिन तपस्या की, पर मानवता को आनन्द, शांति और खुशी से भौतिक जीवन जीते हुए अध्यात्म की ओर बढ़ने का सरल मार्ग बताया।
24 जनवरी 2003, विवेकानन्द जयंती पर भैया जी चैतन्य स्वरूप हो गए। आज उनके उच्च विचार, आदर्श कर्म, दिव्य ज्ञान की अनुभूतियाँ और आध्यात्मिक अनुभव पल-पल जन-जन के मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं।
सैकड़ों लोग उन्हें अपना आदर्श प्रेरक मानकर उनके सिद्धान्तों को जीवन में उतारते हुए गृहस्थ जीवन के साथ-साथ अध्यात्म जगत में भी उन्नति कर रहे हैं।
भैया जी का योगदान इस युग में बेमिसाल है। उन्होंने भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों के अनुरूप नई विचारधारा, नई पद्धति और नया ज्ञान दिया, जिससे मानवीय गुणों को पुनः स्थापित करने के लिए समर्पित चेतना जागृत हो रही है।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा और माँ बसन्ती जी मनिहार ने यह समस्त कार्य न तो प्रसिद्धि के लिए किया, न ही किसी आर्थिक लाभ के लिए — यह उनके लिए मिशन था। स्वामी विवेकानन्द स्टूडेन्ट्स वेलफेयर चैरिटेबल ट्रस्ट की इसी निःस्वार्थ सेवा के लिए राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग ने भैया जी को लगातार पाँच वर्ष — 1999 से 2003 तक — राज्यस्तरीय भामाशाह प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया; जोधपुर एवं बाड़मेर जिलों की छात्राओं को दी गई छात्रवृत्ति और विद्यालय-फर्नीचर सहयोग के लिए।
2003 का अंतिम प्रशस्ति-पत्र भैया जी के चैतन्य स्वरूप होने के पश्चात् भी ट्रस्ट को प्राप्त हुआ, मानो राज्य ने भी उनकी सेवा को अविराम मान्यता दी हो। भैया जी इन सम्मानों को कभी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं मानते थे; वे इन्हें उन जरूरतमंद छात्राओं को समर्पित करते थे, जो कठिनतम परिस्थितियों से निकलकर अपना मार्ग बना रही थीं।
भैया जी के ज्ञान, साधना और बालिका-शिक्षा के प्रति समर्पित कार्य को सम्मान देने और उनकी स्मृति को सदा जीवंत रखने हेतु प्रशासन ने तीन नगरों में उनके नाम से मार्ग समर्पित किए।
पाँचवीं रोड चौराहे से बारहवीं रोड चौराहे तक
प्रथम रेल्वे क्रॉसिंग से मानसरोवर हॉस्पिटल तक
जसोल लघु उद्योग मण्डल से तिलवाड़ा सर्कल तक
भैया जी मानव जाति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले गए। उनका जीवन आज भी वसुधैव कुटुम्बकम्, विश्व-शांति और मानव कल्याण की भावना को जीवंत करता है।