माँ बसन्ती मनिहार
बसन्ती मनिहार अर्थात बसन्ती माँ निहार, अर्थात जगत्जननी माँ को निहार। उनका जीवन भैया श्री नन्दकिशोर शारदा के दिव्य मार्गदर्शन में प्रेम, त्याग, साधना, ज्ञान-प्रसार और मानव कल्याण का एक विलक्षण उदाहरण है।
जोधपुर
भैया जी के मार्गदर्शन में
साधना का केन्द्र
रविवार सेवा
निरंतर मार्गदर्शन
एक क्षण में अध्यात्म को जीवन का ध्येय बना लिया
सन् 1964 में जब माँ बसन्ती जी भैया श्री नन्दकिशोर शारदा से मिलीं, उनके आध्यात्मिक चिंतन और तेजस्विता से आकर्षित होकर उन्होंने सरलता से पूछा, “भैया, क्या जगत्जननी माँ हैं और दर्शन देती हैं?”
भैया जी का स्पष्ट और सत्य उत्तर सुनकर, “हाँ, जगत्जननी माँ हैं और दर्शन देती हैं,” वे संतुष्ट, मुग्ध और भावविभोर हो गईं। उसी क्षण उन्होंने कहा कि वे भी उनके मार्गदर्शन में अध्यात्म मार्ग ग्रहण करेंगी। यह निर्णय भावुक आवेग नहीं था, बल्कि जगत्जननी माँ का प्यार पाने और अध्यात्म-सागर से मोती निकालने का दृढ़ संकल्प था।
सरलता, सात्विकता और परोपकार से भरा प्रारम्भ
माँ बसन्ती मनिहार का जन्म 28 सितंबर 1942 को जोधपुर के अत्यंत सम्माननीय, संभ्रान्त, सम्पन्न, सुसंस्कृत और सुशिक्षित परिवार में हुआ। वे एडवोकेट श्री सोहनलाल मनिहार की सुपौत्री तथा एडवोकेट श्री हरकलाल जी मनिहार और श्रीमती सिरेकंवर की सुपुत्री थीं।
उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और बचपन से ही सरल, सात्विक तथा परोपकारी विचारों की रहीं। भैया श्री नन्दकिशोर शारदा उनके बुआ के लड़के थे, पर आगे चलकर यही पारिवारिक संबंध एक दिव्य मार्गदर्शन और साधना संबंध में रूपांतरित हुआ।
कठिन परीक्षाओं के बाद अलौकिक साधना का आरम्भ
उनके पिता ने माँ बसन्ती जी और उनके मार्गदर्शक अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा की कई कठिन आध्यात्मिक परीक्षाएँ लीं। इन परीक्षाओं के बाद उन्हें अध्यात्म में जाने की आज्ञा मिली।
श्री शारदा जी के पथ-प्रदर्शन में उन्होंने सन् 1964 से समस्त सुख-सुविधाएँ त्याग कर जगत्जननी माँ की बच्ची बनकर अलौकिक साधना की। भैया जी से उन्होंने दिव्य शाश्वत ज्ञान प्राप्त किया। भैया जी ने उन्हें शक्तियाँ देकर तराशा, जगत्जननी माँ के प्रेम और वात्सल्य में सरोबार किया, और उनके भीतर अध्यात्म को आत्मसात कराया।
“बसन्ती, माँ की लाडली”
भैया जी ने माँ बसन्ती जी के लिए अपनी डायरी में अत्यंत आत्मीय भाव से लिखा कि वे उनके पथ-प्रदर्शक हैं, और माँ उनकी वात्सल्यमयी माँ तथा गुरु हैं। उन्होंने माँ बसन्ती जी के सच्चे प्रेम, त्याग और दिन-रात माँ-माँ जपने की साधना को अनुपम और अनुकरणीय बताया।
“इसका मेरी राय में माँ और अपने प्रेम के लिए त्याग अनुपम और अनुकरणीय है। आजीवन ब्रह्मचारिणी और निर्मल जीवन, यह कोई बहुत बड़ी शक्ति है।”— भैया जी की डायरी से भाव
सिद्ध साधना से जाग्रत हुआ मणिद्वीप
काफी लंबे समय तक भैया श्री नन्दकिशोर शारदा और माँ बसन्ती जी ने मनिहारों की हवेली, कबूतरों के चौक, में एकनिष्ठ होकर साधना की और साधना की चरमावस्था को प्राप्त किया।
सन् 1995 में बसन्त पंचमी के शुभ दिन माँ त्रिपुरसुन्दरी की आज्ञा से मणिद्वीप का निर्माण पूरा हुआ। 10 जून 1995 को माँ परिवार मणिद्वीप में स्थानांतरित हुआ। यहाँ भी दोनों की दिव्य साधना अनवरत जारी रही।
भैया जी के चैतन्य स्वरूप होने के बाद दो अटल संकल्प
सन् 2003 में भैया जी चैतन्य स्वरूप हो गए। माँ बसन्ती जी की प्रार्थना के कारण वे आज भी चैतन्य स्वरूप से मणिद्वीप में विद्यमान माने जाते हैं। भैया जी के चैतन्य स्वरूप होने पर माँ बसन्ती जी ने अपना समस्त अस्तित्व अपने मार्गदर्शक के चरणों में समर्पित कर दिया।
उन्होंने दो संकल्प किए: पहला, जनकल्याण के लिए भैया जी के ज्ञान को सरल बनाकर प्रचार-प्रसार करना; दूसरा, जब तक होश में रहें, सदैव सत्कर्म करते रहना। उन्होंने इन दोनों संकल्पों को कठिन परिस्थितियों में भी जीवनपर्यंत निभाया।
उन्होंने “मणिद्वीप का अध्यात्म पुरुष - श्री नन्दकिशोर शारदा”, “मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार” और “माँ त्रिपुरसुन्दरी के लाडले चक्रधारी युगप्रवर्तक अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा” जैसे ग्रंथों का प्रकाशन और वितरण करवाकर दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया।
परमानन्द को निःस्वार्थ बाँटने की सेवा
सन् 1964 से भैया जी के मार्गदर्शन में माँ बसन्ती जी ने जगत्जननी माँ की असीम कृपा और परमानन्द का स्वाद चखा। उसी परमानन्द को निःस्वार्थ भाव से बाँटकर उन्होंने मानव मात्र की जिज्ञासाओं को संतुष्ट किया।
सन् 2007 से मणिद्वीप में प्रत्येक रविवार सुबह छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास के लिए संस्कार कक्षाएँ और शाम को आध्यात्मिक ज्ञान चर्चाएँ आयोजित होने लगीं। इन कक्षाओं ने विद्यार्थियों में सुसंस्कार, व्यक्तित्व विकास, आत्मविश्वास, ईश्वर के प्रति श्रद्धा और शिक्षा के प्रति रुचि को जागृत किया।
रविवार की ज्ञान चर्चाओं से विचारों में परिवर्तन, सकारात्मक दृष्टिकोण और तनाव-मुक्त आनन्दमय जीवन की प्रेरणा मिली। माँ बसन्ती जी के संरक्षण में मणिद्वीप आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन-चैतन्यता का केन्द्र बन गया।
माँ की आज्ञा से पवित्र साधना-स्थली का संरक्षण
एक बार अपने साधना कक्ष में गहन साधना के क्षणों में माँ बसन्ती जी को जगत्जननी माँ का आदेश मिला कि उस स्थान को खरीद लो। बाद में स्पष्ट हुआ कि माँ अपने लाडले बेटे भैया श्री नन्दकिशोर शारदा की जाग्रत साधना-स्थली को स्वयं रखना चाहती हैं।
प्रक्रिया अत्यंत कठिन और लगभग असंभव थी, पर माँ बसन्ती जी ने माँ की आज्ञा को शिरोधार्य किया। चमत्कारिक ढंग से वह स्थान अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा साधना-स्थली सिद्धपीठ में परिवर्तित हुआ। आज वह तपोभूमि पूर्ण चैतन्य और दर्शनीय स्थान है।
भौतिक जीवन में रहकर भी चैतन्यता का अनुभव
भैया जी प्रदत्त बुद्धि-विवेक आधारित साधना पद्धति और ज्ञान द्वारा माँ बसन्ती जी चैतन्यता और भौतिकता का समन्वय कर मानव जीवन का उद्देश्य समझाती थीं। जिज्ञासुओं की कठिन समस्याओं का समाधान वे शीघ्र और सहज रूप से कर देती थीं।
उन्होंने अनेक जिज्ञासुओं के पारिवारिक जीवन को आनन्दमय बनाया। उनके मार्गदर्शन में विचारों में सकारात्मक परिवर्तन, देखने का दृष्टिकोण बदलना और अध्यात्म की नींव रखना सम्भव हुआ। वे आज भी चैतन्य स्वरूप से साधकों का मार्गदर्शन कर रही हैं।
वात्सल्य, साधना और शाश्वत एकत्व की ज्योति
माँ बसन्ती जी के जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को “मणिद्वीप की एक दीपशिखा - जीजी बसन्ती मनिहार” पुस्तक में काव्य रूप में दर्शाया गया है। 7 मई 2021 को वे भी चैतन्य स्वरूप हो गईं।
मणिद्वीप परिवार की भावधारा में वे आज भी भैया जी और जगत्जननी माँ के साथ मणिद्वीप में विराजमान मानी जाती हैं, उसका संचालन करती हैं और साधकों का अध्यात्म के क्षेत्र में मार्गदर्शन करती हैं। वास्तव में जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी, भैया नन्दकिशोर शारदा और माँ बसन्ती एक ही चैतन्य सत्य की अनुभूति हैं।
माँ बसन्ती जी का जीवन, साधना से सेवा तक का जीवंत सेतु है
उन्होंने भैया जी के दिव्य ज्ञान को सरल बनाया, उसे जनकल्याण में उतारा और मणिद्वीप को चैतन्यता, संस्कार और आत्मीय मार्गदर्शन का केन्द्र बनाया।