भैया जी की साधना काल की यात्रा
तमोगुण, भौतिकवाद और अज्ञान के अंधकार से दिग्भ्रमित युग में, जगत्जननी माँ ने ज्ञान का प्रकाश जगाने और मानवता को सरल, सार्वभौमिक तथा युगानुकूल आध्यात्मिक मार्ग देने के लिए अपने लाडले श्री नन्दकिशोर शारदा को इस धरती पर भेजा।
तपोभूमि जोधपुर
15 वर्ष की आयु
जागृत मंदिर
माँ का दर्शन
अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला संकल्प
इस युग में तमोगुण प्रबल हो रहा है और रजोगुण एवं सतोगुण क्षीण हो रहे हैं। भौतिकवाद की चकाचौंध, अवगुणों के विस्तार और अज्ञान के अंधकार से मानवता दिग्भ्रमित है।
ऐसे समय में एक सरल, प्रभावी, सार्वभौमिक और इस युग के अनुरूप ज्ञान के प्रकाश द्वारा अंधकार को मिटाने तथा मिशन की पूर्ति हेतु जगत्जननी माँ ने अपने दो लाडले बच्चों, श्री नन्दकिशोर शारदा और सुश्री बसन्ती मनिहार, को इस जगत् में भेजा।
तपोभूमि जोधपुर में एक तेजस्वी जीवन का प्रारम्भ
श्री नन्दकिशोर शारदा का जन्म 16 जुलाई 1944 को तपोभूमि जोधपुर में श्रीमती तुलसी देवी एवं श्री विजयकिशन जी शारदा के सम्पन्न और भक्तिमय परिवार में हुआ। बाल्यकाल से ही उनमें ज्ञान की प्रबल पिपासा, मेधा और सद्साहित्य के प्रति रुचि थी।
उनका चिंतन दार्शनिक, वैज्ञानिक और तार्किक था। अद्भुत वाक्शक्ति, भावाभिव्यक्ति और अलौकिक आकर्षण उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट विशेषताएँ थीं। उनके सरल, पवित्र विचारों और आत्मीय स्वभाव के कारण सभी उन्हें स्नेहपूर्वक भैया अथवा भैया जी कहकर सम्बोधित करते हैं।
बाल्यकाल से लिखी डायरी में दिखता मूल स्वरूप
भैया जी में बचपन से ही त्याग, प्रेम, सरलता, दृढ़ संकल्प, परोपकार, करुणा, निःस्वार्थता और लक्ष्य के प्रति जुनून जैसे गुण व्याप्त थे। उनकी हस्तलिखित डायरी इन गुणों और उनके अंतर्मन की पवित्रता की झलक देती है।
“आज का समाज किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन करता हैं सिर्फ उसके चन्द स्वार्थों पर। अगर मनुष्य स्वार्थ सिद्ध है तो वह होशियार है नहीं तो वो बेवकूफ। इस प्रकार मुझे समाज ने बेवकूफ की श्रेणी में डाला हे। मैं वास्तव में होशियार बनाना नहीं चाहता वहाँ आत्मिक शान्ति नही है।”नन्दकिशोर शारदा
भैया जी की डायरी उनकी दिव्य चैतन्य यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। 12 वर्ष की अल्पायु से लिखी गई यह मूल प्रमाणित डायरी उनके चिंतन, मनन, साधना, समर्पण, स्व-अनुभव और जिज्ञासा का शुद्ध प्रतिबिंब है।
“मैं कौन हूँ?” से प्रारम्भ हुई सत्य की खोज
सन् 1959 में जब भैया जी मात्र 15 वर्ष के थे, उनके पिताजी का देहान्त हो गया। यह घटना उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लेकर आई। उसी रात उनकी डायरी में लिखे उद्गार उनके भीतर उठे मौलिक प्रश्नों को स्पष्ट करते हैं।
“आज मेरे सामने वही चिता से उठती लपटें हैं। हमारा भ्रम है। कोई अपना नही हैं। कोई मेरा नही। यह शरीर भी मेरा नही। मैं कौन हूँ व कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाउँगा। मुझे खोज करनी हैं मैं कोन हूँ व मुझे कोन चला रहा है। मेरे पिताजी कहाँ गये। मेरे वास्तविक माता पिता कोन हैं।”
उन परिस्थितियों में भी उनके मन में संसार की नश्वरता, असहायपन, मानव अस्तित्व और शरीर को चलायमान रखने वाली शक्ति के प्रश्न उठे। उन्होंने श्मशान में ही दृढ़ संकल्प लिया कि वे इस भौतिक शरीर को संचालित करने वाली चैतन्य शक्ति की वास्तविकता को खोजकर रहेंगे।
उन्होंने विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, साधु-महात्माओं, तांत्रिकों और आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया, परन्तु उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि अब इस रहस्य का समाधान उन्हें स्वयं खोजना होगा।
जागृत मंदिर में मिली असीम शांति और माँ की ओर आकर्षण
एक दिन चिंतन करते हुए वे जोधपुर किले के आसपास घूम रहे थे कि एक पहाड़ी पर स्थित टेकरी की ओर अनायास आकर्षित होकर पहुँचे। गुफानुमा मंदिर में प्रवेश करते ही उन्हें असीम शांति का अनुभव हुआ और माँ त्रिपुरसुन्दरी के विग्रह के दर्शन करते ही वे ध्यानमग्न हो गए।
टेकरी मंदिर में जगत्जननी माँ की अपरिमित शक्ति, तेज और चैतन्यता थी। भैया जी में सत्य की खोज का दृढ़ निश्चय, पूर्ण समर्पण, त्याग और जुनून था। वे माँ त्रिपुरसुन्दरी के चरणों में पूर्ण समर्पित होकर उन्हें अपना पथप्रदर्शक मानकर दिन-रात कठोर साधना करने लगे।
“माँ भवानी आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। आज से मेरी पथप्रदर्शक आप हैं। अब मैंने मेरा सारा भार आप पर छोड़ दिया है।”आपका पुत्र, किशोर
भैया जी रात-रात भर टेकरी पर रहकर माँ की साधना और आराधना में डूब गए। कई-कई दिन तक भूखे-प्यासे, कभी दिन भर में केवल एक पाव पालक पर निर्वाह करते हुए वे माँ के दर्शन के लिए आँसू बहाते रहते।
उनके हस्ताक्षर भी उनके भावों के अनुरूप बदलते गए: नन्दकिशोर शारदा, फिर किशोर, और अंत में किशोर माँ का लाडला। यह माँ के साथ उनके सम्बन्ध की निरंतर प्रगाढ़ता और साधना की परिपक्वता का संकेत था।
जब माँ ने दर्शन दिए, भैया जी ने चरण पकड़ लिए
भैया जी ने निःस्वार्थ भाव से माँ-बेटे का सम्बन्ध स्थापित कर स्वयं को जगत्जननी माँ को पूर्णतः समर्पित कर दिया। माँ के विरह में वे व्याकुल होकर पुकारते, “माँ, मुझे दर्शन दें।”
दीर्घ साधना के बाद उन्हें बोध हुआ कि आध्यात्मिक इच्छाएँ भी साधना में बाधक हो सकती हैं। उन्होंने दर्शन की इच्छा सहित अपने जीवन के उद्देश्य और संकल्प भी माँ को समर्पित कर दिए। उनका भाव था कि वे केवल माँ से प्रेम करते हैं और करते रहेंगे।
“वात्सल्यमयी माँ जिसे मैं कभी परवरदिगार, कभी मम्मी व कभी माँ कहता हूँ, वह मेरी जन्मदात्री जननी हैं व गुरु हैं। वही मेरी सर्वस्व है। मैंने मेरा तन, मन, धन जीवन व जीवन का सम्पूर्ण प्रेम उसी के चरणों में चढ़ाया है। वास्तव में उसके चरणो की पूजा व उसके चरणो से प्रेम यही तो मेरा जीवन लक्ष्य है। उसने मुझे दर्शन दिए तब दौड़ कर मेने उसके चरण ही पकड़े थे। वही सर्वस्व है।”
यह अंश स्पष्ट करता है कि भैया जी ने माँ को अपना गुरु माना और अपना सर्वस्व उनके चरणों में समर्पित कर दिया। माँ से अलग उनका अपना अस्तित्व रहा ही नहीं। वे माँ से दूध-शक्कर की तरह घुल-मिल गए।
चैतन्यता, ब्रह्माण्ड और दिव्य लोकों का स्व-अनुभव
दर्शन के बाद माँ ने उन्हें पुत्र स्वीकार किया और स्वयं उनकी गुरु बनकर उनसे सर्वोच्च स्तर की दिव्य साधनाएँ करवाईं। माँ ने उन्हें चैतन्यता और ब्रह्माण्ड की संरचना, ब्रह्मकणों की संरचना, दो शरीर की अवधारणा, चैतन्य शरीर का उद्गम स्थान, दिव्य लोकों का निर्माण आदि का स्व-अनुभव कराया।
कालांतर में इसी अमृततुल्य ज्ञान को भैया जी ने दिव्य मौलिक ग्रंथ “मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार” में लिपिबद्ध करवाया। यह ज्ञान केवल विचार नहीं, बल्कि उनके तप, समर्पण, साधना और माँ की कृपा से प्राप्त अनुभूति का प्रकाश है।
भैया जी की साधना यात्रा आज भी साधकों को दिशा देती है
उनकी साधना केवल व्यक्तिगत आत्मकल्याण तक सीमित नहीं रही। वह माँ प्रदत्त दिव्य ज्ञान, सरल साधना पद्धति और मानव कल्याण की निष्काम सेवा के रूप में जन-जन तक प्रवाहित हो रही है।