शिक्षा से कोई वंचित न रहे
अर्थाभाव किसी छात्रा की पढ़ाई में बाधा न बने। शिक्षा-सहयोग उसके शैक्षिक, नैतिक, बौद्धिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान का माध्यम बने।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा के शिक्षा-दर्शन से जन्मे वे सूत्र, जिनके आधार पर मणिद्वीप की छात्रवृत्ति और शिक्षा-सेवा संचालित होती है — शिक्षा को अधिकार, संस्कार को आधार और आत्मनिर्भरता को जीवन की सार्थक दिशा मानते हुए।
शिक्षा तभी पूर्ण है, जब वह ज्ञान के साथ संस्कार, विनम्रता और कर्तव्यबोध भी विकसित करे।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा के शिक्षा-दर्शन का मूल आधार यह विश्वास था कि शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और आर्थिक अभाव किसी भी बालिका के भविष्य में बाधक नहीं बनना चाहिए। ईश्वर ने हर व्यक्ति को कोई न कोई प्रतिभा दी है; शिक्षा उसी प्रतिभा को पहचानने, विकसित करने और जीवन को सार्थक दिशा देने का माध्यम है — इसलिए यह सुविधा-सम्पन्न वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचनी चाहिए।
वे शिक्षा और संस्कार को एक-दूसरे का पूरक मानते थे। उनके लिए शिक्षित व्यक्ति वही है जो ज्ञानवान होने के साथ विनम्र, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ भी हो। वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास को एक साथ आगे बढ़ाए तथा उसे अपने भीतर की शक्ति पहचानने और जीवन को व्यापक उद्देश्य से जोड़ने की प्रेरणा दे।
बालिका शिक्षा को वे महिला सशक्तिकरण की आधारशिला मानते थे। एक शिक्षित और संस्कारित बालिका आगे चलकर परिवार को दिशा देती है, संतानों की पहली शिक्षिका बनती है और समाज की जिम्मेदार नागरिक।
इसी दूरदृष्टि से छात्रवृत्ति का निर्धारण केवल परीक्षा के अंकों से नहीं, बल्कि आर्थिक आवश्यकता, पारिवारिक परिस्थिति और शिक्षा की वास्तविक लागत को ध्यान में रखकर किया गया — और जाति, धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं रखा गया।
ये सिद्धान्त छात्रवृत्ति को केवल आर्थिक सहायता नहीं रहने देते, बल्कि उसे शिक्षा, संस्कार, व्यक्तित्व-विकास और पारदर्शी सेवा का माध्यम बनाते हैं।
अर्थाभाव किसी छात्रा की पढ़ाई में बाधा न बने। शिक्षा-सहयोग उसके शैक्षिक, नैतिक, बौद्धिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान का माध्यम बने।
बालिकाओं में ज्ञान के प्रति समर्पण, गरिमा, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, मानवीय संवेदना और करुणा जैसे गुण विकसित हों।
विद्यार्थी अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। प्रकृति के संसाधनों पर समान अधिकार के साथ प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर की भावना विकसित हो।
मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पहलुओं का सकारात्मक समन्वय हो, ताकि बालिकाओं का व्यक्तित्व संतुलित और सशक्त रूप से विकसित हो सके।
टेलीफोन, डाक टिकट, स्टेशनरी और आवागमन जैसे प्रशासनिक व्यय ट्रस्ट के सदस्य व्यक्तिगत रूप से वहन करते हैं, ताकि ट्रस्ट की सम्पूर्ण आय छात्रवृत्ति में उपयोग हो सके।
आर्थिक सहयोग की राशि बैंकों में सावधि जमा के रूप में सुरक्षित रखी जाती है और उससे प्राप्त सम्पूर्ण ब्याज छात्राओं में छात्रवृत्ति के रूप में वितरित किया जाता है।
पंजीकरण दस्तावेज़, वर्ष-वार अंकेक्षित वित्तीय प्रतिवेदन और छात्रवृत्ति प्रमाण-पत्र — सभी पारदर्शिता पृष्ठ पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
इन सिद्धान्तों से सेवा-कार्य में करुणा के साथ स्पष्टता, समानता के साथ उत्तरदायित्व और छात्रवृत्ति के साथ चरित्र-निर्माण का भाव जुड़ा रहता है। यही समन्वित दृष्टि आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द स्टूडेन्ट्स वेलफेयर चैरिटेबल ट्रस्ट की कार्यपद्धति की आधारशिला बनी।