चैतन्य, साधना एवं आध्यात्मिक ऊर्जा के दिव्य केन्द्र

दिव्य साधना-स्थल

जिन स्थानों पर महान ऋषि-मुनियों, साधु-संतों और सिद्ध साधकों ने अपना आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त किया, वे स्थान चैतन्यता से सराबोर, ऊर्जा से जाग्रत और तपोभूमि बन जाते हैं। ऐसे पवित्र स्थान पर साधना करने से साधक की साधना शीघ्र ही फलीभूत होने लगती है।

भैया जी एवं माँ बसन्ती जी ने जिन स्थानों पर जगतजननी माँ की उच्च कोटि की निःस्वार्थ प्रेम-समर्पण साधना की, वे स्थान सघन चैतन्यता और दिव्य ऊर्जा के स्रोत हैं।

भैया जी एवं माँ बसन्ती जी की निःस्वार्थ प्रेम-समर्पण साधना से जाग्रत वे पावन स्थल, जहाँ आज भी शांति, चैतन्यता और दिव्य ऊर्जा का अनुभव साधकों को भीतर तक स्पर्श करता है।
01

गुरु-स्थल और साधना का आरम्भ

टेकरी

टेकरी माँ मंदिर की स्थानापन्न छवि

15 वर्ष की आयु में जगी सत्य की पुकार

भैया श्री नन्दकिशोर शारदा की आध्यात्मिक साधना का प्रारम्भ सन् 1959 में मात्र 15 वर्ष की आयु में हुआ। पिता के आकस्मिक निधन ने उनके भीतर उस चैतन्य शक्ति को जानने का संकल्प जगाया, जो मानव शरीर को जीवित और गतिशील रखती है।

इसी आंतरिक पुकार से वे जोधपुर किले के पीछे लगभग 250-300 फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित प्राचीन, गुफानुमा ‘टेकरी माँ’ मंदिर पहुँचे, जो आगे चलकर उनका गुरु-स्थल और साधना-स्थली बना।

भैया जी टेकरी माँ की गुफा में साधना करते हुए

प्रेम, भक्ति और पूर्ण समर्पण की साधना

उन्होंने माँ त्रिपुरसुन्दरी को अपना गुरु एवं माँ मानकर प्रेम, भक्ति और पूर्ण समर्पण की साधना अपनाई। साधना की निर्धारित विधि न होने पर उन्होंने अनेक आध्यात्मिक प्रयोग किए और अपना सम्पूर्ण अस्तित्व माँ के चरणों में अर्पित कर दिया।

उनकी निष्काम साधना से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें दर्शन दिए और पुत्रवत् स्वीकार किया। टेकरी माँ का यह पावन स्थल आज भी भैया जी की साधना, समर्पण और दिव्य अनुभूतियों की जीवंत स्मृति के रूप में चैतन्यता से स्पंदित है।

02

भैया जी की साधनास्थली

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा की साधनास्थली - सिद्धपीठ

सिद्धपीठ की स्थानापन्न छवि

छोटे से कक्ष में साधना की नयी ऊँचाइयाँ

‘माँ’ की भक्ति और समर्पण का सिलसिला शिवदत्त महाराज की गद्दी में भी कुछ वर्ष चला। फिर सन् 1982 से मनिहारों की हवेली में एक छोटे से कोठरीनुमा कमरे को उन्होंने अपना साधनास्थल बनाया।

वहीं ध्यान मुद्रा में आसीन होकर वे कठिन साधना, चिंतन और मनन करते थे। 1982 से 1995 तक अध्यात्म साधना द्वारा अर्जित स्वयं की सारी शक्तियों को उन्होंने इस पवित्र स्थल पर एकत्रित कर दिया, जिससे यह स्थल जाग्रत एवं चैतन्यमय हो गया।

इस साधनास्थली की इमारत में ऊपर और नीचे दो बड़े हॉल हैं। ऊपर वाले हॉल में वह स्थान है जहाँ भैया जी घण्टों एकान्त साधना में रत रहते थे — उसे आज भी मूल स्वरूप में सुरक्षित रखा गया है, जो अत्यन्त दुष्कर किन्तु उतना ही महत्वपूर्ण कार्य था।

सिद्धपीठ साधना कक्ष की स्थानापन्न छवि

साधकों के लिए जाग्रत ऊर्जा का केन्द्र

सन् 2006 में जगतजननी माँ ने माँ बसन्ती जी को आज्ञा दी कि यह पवित्र स्थान खरीद लिया जाए, जिससे आने वाले जिज्ञासुओं और साधकों को भी ऊर्जा प्राप्त हो और उनका मार्ग प्रशस्त हो। माँ त्रिपुरसुन्दरी की कृपा से यह कठिन कार्य भी चमत्कारिक ढंग से सम्पन्न हुआ।

आज यह दिव्य तपोभूमि ‘अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा साधनास्थली सिद्धपीठ’ के रूप में प्रतिष्ठित है। शहर के मध्य कोलाहल भरे वातावरण में स्थित होने पर भी इसके भीतर अद्भुत शांति है और यहाँ तुरन्त ध्यान लग जाता है। ‘सिद्धपीठ’ का शाब्दिक अर्थ है — वह पावन आध्यात्मिक स्थल, जहाँ श्रद्धा, भक्ति और निष्ठापूर्वक की गई साधना शीघ्र फलित होती है।

03

माँ बसन्ती जी की साधनास्थली

वात्सल्यपीठ

वात्सल्यपीठ का द्वार — माँ बसन्ती मनिहार की साधना स्थली

तीस वर्षों से अधिक की प्रेम-समर्पण साधना

भैया जी ने जब माँ बसन्ती जी को साधना के लिए प्रेरित किया, तब माँ बसन्ती जी ने जगतजननी माँ की साधना मनिहार भवन में प्रारम्भ की। सन् 1964 में औपचारिक अनुमति मिलने के बाद उन्होंने एक छोटे से कमरे को अपनी साधना-स्थली बनाया।

1964 से 1995 तक, तीस वर्ष से अधिक समय तक उन्होंने वहाँ पूर्ण प्रेम-समर्पण साधना की। वही छोटा सा कमरा उनका जगत था - वहीं साधना, ज्ञान चर्चा, विश्राम और ‘माँ’ में लीन जीवन।

वात्सल्यपीठ साधना कक्ष की स्थानापन्न छवि

वात्सल्यपूर्ण दृष्टि और चैतन्य कवच

माँ बसन्ती जी सदैव जगतजननी माँ की वात्सल्यपूर्ण दृष्टि में रहीं। उन पर ‘माँ’ का कृपामयी वरदहस्त और अभयहस्त रहा। इस साधनास्थली पर ऐसा चैतन्य कवच रहता था कि कोई भी तमोगुणी शक्ति अथवा व्यक्ति उसके पास फटकने की हिम्मत नहीं कर सकता था। इसीलिए इसका द्वार दिन में केवल लगभग एक घण्टे के लिए, ‘माँ’ की आज्ञा प्राप्त कुछ चुनिन्दा सद्गुणी व्यक्तियों के लिए ही खुलता था।

इन सबके फलस्वरूप माँ बसन्ती जी की साधनास्थली चैतन्यता से परिपूर्ण एक तपोभूमि बन गई। आज भी उसकी चैतन्यता अक्षुण्ण है। ‘माँ’-भैया जी की आज्ञा से अब इस साधनास्थली का नाम ‘वात्सल्यपीठ’ है।

04

ज्ञान, सेवा और कर्म साधना का केन्द्र

मणिद्वीप

गोवा में समुद्र के मध्य चट्टान पर चक्र धारण की मुद्रा में भैया जी

धरती पर जगतजननी माँ के दिव्य लोक का प्रतीक

सन् 1990 में, दक्षिण भारत की यात्रा के अंतिम पड़ाव में, भैया जी एवं ‘माँ परिवार’ के सदस्य गोवा पहुँचे। वहाँ भैया जी समुद्र के मध्य स्थित एक चट्टान पर परिवार के सदस्यों के साथ चढ़े और ज्ञान चर्चा करने लगे। चर्चा समाप्त होने पर सब लोग नीचे उतर आए, परन्तु भैया जी दौड़कर पुनः उसी चट्टान पर चढ़ गए और शान्त, गम्भीर भाव से बोले — ‘अब मैं चक्र धारण करता हूँ’ — और चक्र धारण की सांकेतिक मुद्रा में खड़े हो गए। उस क्षण उनका मुख तेजोमय हो उठा और रोम-रोम से चैतन्यता प्रस्फुटित होने लगी। उपस्थित सभी सदस्य इस अद्भुत दिव्य घटना के साक्षी बने और रोमांचित हो उठे।

भैया जी के चक्र धारण करने को चैतन्य जगत ने उन्हें युगप्रवर्तक के रूप में स्वीकार करने और एक नए युग के शंखनाद के रूप में देखा। इसके पश्चात ‘माँ’ की आज्ञा अनुसार भैया जी कर्म साधना में अग्रसर हुए, जिसके फलस्वरूप 1995 में ‘मणिद्वीप’ का निर्माण पूर्ण हुआ और ‘माँ परिवार’ यहाँ आकर रहने लगा।

‘मणिद्वीप’ अर्थात जगतजननी माँ का दिव्य लोक। धरती पर ए-183, शास्त्री नगर, जोधपुर स्थित ‘मणिद्वीप’ उसी दिव्य लोक का प्रतीक है, जिसका निर्माण जगतजननी माँ की आज्ञा से हुआ।

मणिद्वीप मिशन केन्द्र की स्थानापन्न छवि

ज्ञान, सेवा और मानव कल्याण की धारा

‘मणिद्वीप’ में बालिका शिक्षा के लिए ट्रस्ट का निर्माण और अन्य सेवा कार्य आरम्भ हुए। जगतजननी माँ प्रदत्त ज्ञान को दिव्य ग्रंथ ‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ के रूप में लिपिबद्ध कराया गया और इस ज्ञान के प्रचार-प्रसार के विभिन्न प्रकल्प शुरू हुए।

भैया जी, माँ बसन्ती जी और मणिद्वीप अध्यात्म परिवार के सदस्यों की साधना के प्रभाव से यह स्थल एक तपोभूमि है, जहाँ जगतजननी माँ स्वयं विराजती हैं और सभी कार्यों का संचालन करती हैं।

मणिद्वीप के निर्माण की पूरी कथा पढ़ें
अनुभव का आमंत्रण

इन स्थलों की शांति को स्वयं अनुभव करें

दिव्य साधना-स्थल केवल देखने के स्थान नहीं, बल्कि चित्त को शांत करने, जिज्ञासा को गहराने और साधना के भाव को भीतर जगाने वाले जीवंत केन्द्र हैं।