जिज्ञासा
प्रबल जिज्ञासा से लक्ष्य को पाने का दृढ़ निश्चय और जुनून उत्पन्न होता है। मणिद्वीप में अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा तर्क और बुद्धि के आधार पर जाग्रत की जाती है।
अलौकिक आनन्द, प्रेम और शांति की ओर ले जाने वाला यह प्रतीक चिन्ह मणिद्वीप की आध्यात्मिक पहचान और साधना के मूल उद्देश्य को संक्षेप में प्रकट करता है।
प्रतीक चिन्ह अर्थात पहचान। मणिद्वीप की पहचान है - विश्व-बन्धुत्व, विश्व-शान्ति एवं मानव कल्याण हेतु प्रयासरत अध्यात्म समर्पित परिवार। इसकी विशेषता यह है कि यह किसी धर्म विशेष से संबंधित नहीं है; कोई भी इसे अपनाकर अपना कल्याण कर सकता है।
अध्यात्म समर्पित परिवार जगत्जननी माँ को मानता है, इसलिए प्रतीक चिन्ह के मध्य में ‘माँ’ है। इसी भाव से कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के प्रवर्तक को मध्य में रखकर इन सोपानों द्वारा स्वयं का कल्याण कर सकता है।
यह परिवार समस्त विश्व में आनन्द, शांति और खुशी फैलाने के लिए प्रयासरत है। मणिद्वीप आपसी प्रेम से बना ऐसा परिवार है जिसका आधार विशुद्ध प्रेम है।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने अपने जीवन काल में ही मणिद्वीप के प्रतीक चिन्ह की अवधारणा तैयार कर ली थी, जिसे मूर्तरूप माँ बसन्ती मनिहार ने दिया।
बुद्धि-विवेक योग साधना एक साधन और रास्ता है, जबकि मणिद्वीप का प्रतीक चिन्ह साधना से संबंधित मूल ज्ञान और उद्देश्य है। इसकी भव्यता और प्रभाव का अनुभव तभी होता है जब व्यक्ति इसकी साधना में अग्रसर होता है।
प्रतीक में दिखाया गया क्रम आकस्मिक नहीं है, बल्कि मार्गदर्शक के स्व-अनुभव और गहन चिंतन पर आधारित है। साधक से अपेक्षा की जाती है कि वह इसी क्रम का निष्ठापूर्वक पालन करे।
प्रतीक चिन्ह साधक को भीतर से बाहर तक परिष्कृत करने वाली क्रमबद्ध साधना-दृष्टि प्रस्तुत करता है।
प्रबल जिज्ञासा से लक्ष्य को पाने का दृढ़ निश्चय और जुनून उत्पन्न होता है। मणिद्वीप में अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा तर्क और बुद्धि के आधार पर जाग्रत की जाती है।
सच्चा ज्ञान व्यक्ति को लक्ष्य की ओर आत्मविश्वास से बढ़ने को प्रेरित करता है। बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति साधक के आध्यात्मिक स्तर के अनुरूप पथ-प्रदर्शन करती है।
सत्कर्म वे कार्य हैं जिनसे अध्यात्म उन्नति हो, सद्गुणों का विकास हो और किसी के जीवन निर्माण में वास्तविक सहयोग पहुँचे।
जिज्ञासा, ज्ञान और सत्कर्म से परिपूर्ण व्यक्ति आराधना का सुपात्र बनता है। मन निर्मल और चित्त शांत होने पर ईश्वर का निःस्वार्थ प्रेम एवं स्मरण जीवन का आधार बनने लगता है।
कल्याण लक्ष्य की चरम परिणति है। ईश्वर से जुड़कर कृपा-पात्र बना साधक अपने आभामण्डल से दूसरों में भी सकारात्मक सोच और सही राह की प्रेरणा जगाता है।
प्रतीक चिन्ह साधना की दिशा दिखाता है; बुद्धि-विवेक योग साधना उस दिशा को व्यवहार में उतारने की पद्धति है। यह विचारों में स्पष्टता, निर्णयों में विवेक, मन में संतुलन और जीवन में आनन्द, शांति व सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देती है।