मणिद्वीप अध्यात्म परिवार · जोधपुर

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा मिशन

विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से — गृहस्थ जीवन में रहते हुए आत्मकल्याण का सरल मार्ग।

भैया जी द्वारा प्रदत्त दिव्य ज्ञान एवं ‘बुद्धि-विवेक योग साधना’ के आलोक में — भीतर शान्ति, स्पष्ट विवेक और आनन्द, तथा आगे विश्व-बन्धुत्व, विश्व-शान्ति एवं मानव-कल्याण की ओर एक आध्यात्मिक यात्रा।

यह मिशन क्यों विशिष्ट है

मौलिक दिव्य ज्ञान माँ त्रिपुरसुन्दरी से प्राप्त शाश्वत ज्ञान — तीन पीढ़ियों की जीवंत गुरु-परम्परा।
विज्ञान-सम्मत साधना तर्क और श्रद्धा का समन्वय — गृहस्थ जीवन में विवेक और आनन्द की ओर।
तीन दशकों की निष्काम सेवा शिक्षा और मानव कल्याण — 1996 से अटूट, पूर्णतः पारदर्शी।
समग्र मानव विकास शरीर, मन, भाव और आत्मा — चारों आयामों में संतुलित उन्नति।

पंजीकृत लोक-न्यासों द्वारा संचालित · जाति, धर्म और सम्प्रदाय के भेद के बिना, प्रत्येक जिज्ञासु के लिए।

एक परिचय

यह मिशन किस लिए है

साधना में लीन युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा भैया जी
साधना से प्रकट हुआ मानव कल्याण का सार्वभौमिक मार्ग

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा (भैया जी) ने आज के युग के अनुरूप भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक — तीनों क्षेत्रों की आवश्यकता को देखते हुए एक नई विचारधारा, नई साधना-पद्धति और नया ज्ञान दिया, और इस युग में एक नई आध्यात्मिक चेतना का सूत्रपात किया। इसी कारण उन्हें ‘युगप्रवर्तक’ कहा जाता है।

उन्होंने ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म और योग का समन्वय करके गृहस्थ-अनुकूल ‘बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति’ का प्रतिपादन किया। सुश्री बसन्ती जी मनिहार 1964 में और मधु माँ 1970 में इस साधना-मार्ग से जुड़ीं; उनके सहित अनेक साधकों का आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त हुआ और ‘मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ की स्थापना हुई।

सन् 1996 में ‘माँ’ की आज्ञा से भैया जी ने आध्यात्मिक साधना के साथ शिक्षा, संस्कार, छात्रवृत्ति और मानव सेवा जैसी निष्काम कर्म साधना भी आरम्भ की। आज मधु माँ के नेतृत्व में यह परिवार दिव्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार और निष्काम सेवा — दोनों को निरन्तर आगे बढ़ा रहा है।

आत्मकल्याण से विश्व-कल्याण की ओर

हमारी दृष्टि

विश्व-बन्धुत्व, विश्व-शान्ति एवं मानव-कल्याण से युक्त ऐसे समाज की स्थापना, जहाँ प्रत्येक जीवन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।

हमारा ध्येय

भैया जी द्वारा प्रदत्त दिव्य ज्ञान से मानव की आध्यात्मिक जिज्ञासा का समाधान करते हुए, ‘बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति’ के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को सत्कर्म और आराधना के द्वारा आत्मकल्याण की ओर प्रेरित करना।

एक खोज की शुरुआत · 1959

एक पंद्रह वर्ष के लड़के का संकल्प

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा (भैया जी)

16 जुलाई 1944 को जोधपुर के एक सम्पन्न एवं भक्तिमय परिवार में जन्मे भैया जी विज्ञान के मेधावी छात्र और विलक्षण बुद्धि के स्वामी थे। मात्र 15 वर्ष की आयु में, पिताजी की मृत्यु के पश्चात् उनकी जलती चिता के समक्ष उनके अंतर्मन में गहन वैराग्य जागा।

“मैं इस सत्य को खोजकर रहूँगा — भौतिक शरीर को चलायमान रखने वाली शक्ति कौन-सी है? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मृत्यु के बाद क्या है? क्या ईश्वर हैं?”

इस संकल्प की पूर्ति हेतु उन्होंने अनेक साधु-संतों, तांत्रिकों और महात्माओं से प्रश्न पूछे और अनेक धार्मिक ग्रंथ पढ़े — पर कहीं भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला।

दिव्य ज्ञान

‘माँ’ को गुरु बनाकर प्राप्त शाश्वत ज्ञान

‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ पुस्तक का आवरण

अन्ततः जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी की कृपा से जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के पीछे एक टेकरी पर बने ‘माँ’ के मंदिर में उन्हें अद्भुत शान्ति मिली। वे बच्चे बनकर रात-दिन निःस्वार्थ प्रेम, व्याकुलता और विरह से ‘माँ’ को पुकारने लगे। उनकी सच्ची पुकार सुनकर ‘माँ’ स्वयं को रोक न सकीं — उन्होंने साक्षात् दर्शन देकर भैया जी को अपना लाडला पुत्र स्वीकार किया।

‘माँ’ को ही गुरु मानकर उन्होंने विज्ञान-आधारित दिव्य ज्ञान प्राप्त किया और इसे कालजयी कृति ‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ के रूप में मानवता को समर्पित किया — ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, दिव्य लोक, ब्रह्मकण, भौतिक एवं चैतन्य शरीर, ईश्वर की सत्ता और मृत्यु के पश्चात् की अवस्था का सरल, तार्किक एवं विज्ञान-सम्मत विवेचन — हर धर्म, जाति, आयु और बौद्धिक स्तर के व्यक्ति के लिए।

इस पुस्तक के निष्पक्ष पठन-चिंतन से अनेक नास्तिक व्यक्तियों का आध्यात्मिक रूपान्तरण हुआ है।

यह ग्रंथ क्यों विशिष्ट है?

मौलिक

जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी से प्राप्त दिव्य ज्ञान पर आधारित।

वैज्ञानिक

विज्ञान एवं अध्यात्म का संतुलित समन्वय।

सरल

गूढ़ रहस्यों की सहज एवं बोधगम्य व्याख्या।

शाश्वत

जीवन, मृत्यु, आत्मा एवं ब्रह्माण्ड का आधिकारिक मार्गदर्शक।

आज ‘श्री नन्दकिशोर शारदा ज्ञान गंगा मिशन’ के माध्यम से यह अमृततुल्य ज्ञान निःशुल्क जन-जन तक पहुँचाया जा रहा है, और अनेक विद्वानों ने भी इसकी सराहना की है।

आज के युग की सरल साधना पद्धति

बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति

आधुनिक युग के लिए शाश्वत ज्ञान पर आधारित — जीवन जीने की कला।

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर जी शारदा के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य को दो अमूल्य उपहार दिए हैं — बुद्धि और विवेक। जब बुद्धि निर्मल होती है, तब ज्ञान से विवेक जागृत होता है, और जागृत विवेक व्यक्ति के विचार, चरित्र, निर्णय एवं जीवन को सकारात्मक दिशा देता है। यही इस साधना पद्धति का मूल उद्देश्य है।

जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी से प्राप्त शाश्वत दिव्य ज्ञान को — जिसे भैया जी ने ‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ के रूप में मानवता को समर्पित किया — जीवन में धारण कराने के लिए, और भौतिक जीवन जीते हुए भी आनन्द, शान्ति और आत्मिक उन्नति का अनुभव कराने के लिए उन्होंने यह सरल, वैज्ञानिक एवं अनुभवसिद्ध साधना पद्धति प्रतिपादित की — जो ज्ञान के माध्यम से विवेक जागृत कर व्यक्ति को मनुष्यत्व से देवत्व की ओर अग्रसर करती है।

यह विशिष्ट कैसे है?

सरल
आज की व्यस्त जीवनशैली में सहज रूप से अपनाई जा सकने वाली व्यावहारिक साधना।
वैज्ञानिक
विज्ञान, तर्क, अनुभव और अध्यात्म का संतुलित समन्वय।
समग्र
ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म और योग का मार्ग — भौतिक सफलता और आत्मिक उन्नति, दोनों का आधार।
सार्वभौमिक
जाति, धर्म, आयु, वर्ग और देश की सीमाओं से परे, सम्पूर्ण मानवता के लिए समान रूप से प्रासंगिक।

यह केवल साधना की एक पद्धति नहीं, जीवन जीने की एक समग्र शैली है — जो व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, संयम, विवेक और सद्गुणों का विकास कर उसे स्वयं, परिवार, समाज और मानवता के कल्याण का माध्यम बनाती है।

आज यह साधना मणिद्वीप एवं अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा साधना-स्थली (सिद्धपीठ) में सिखाई जाती है — प्रत्येक साधक की जिज्ञासा, बौद्धिक क्षमता और व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुरूप। जिसकी जितनी लगन और अभ्यास, उतनी ही सच्ची खुशी और सच्ची शान्ति।

चक्र धारण का दिव्य क्षण

युग परिवर्तन का सूत्रपात

समुद्र के मध्य चट्टान पर चक्र धारण की मुद्रा में भैया जी
‘माँ परिवार’ की गोवा यात्रा · वर्ष 1990
“अब मैं चक्र धारण करता हूँ।”

वर्ष 1990 में दक्षिण भारत की आध्यात्मिक यात्रा के दौरान जब भैया जी और ‘माँ परिवार’ के कुछ सदस्य गोवा पहुँचे, तब समुद्र के मध्य स्थित एक चट्टान पर भैया जी ने शान्त एवं गम्भीर भाव से यह कहा और दैवीय शक्तियों का आह्वान करते हुए चक्र धारण की सांकेतिक मुद्रा धारण की। उनका तेजोमय मुखमण्डल, दिव्य आभा और प्रत्यक्ष चैतन्यता उपस्थित सदस्यों के लिए एक अभूतपूर्व अनुभूति बन गई — सम्पूर्ण वातावरण आनन्द, शान्ति और दिव्य ऊर्जा से स्पंदित हो उठा। कुछ क्षण उस अलौकिक भाव में स्थित रहने के पश्चात् भैया जी धीरे-धीरे अपने स्वाभाविक रूप में लौट आए।

यह क्षण भैया जी की दीर्घकालीन साधना, आध्यात्मिक यात्राओं से अर्जित ज्ञान, प्राप्त दिव्य चैतन्य शक्तियों और जगत्जननी माँ की कृपा की चरम परिणति था — जगत्जननी माँ ने स्वयं भैया जी से चक्र धारण करवाया। यह केवल एक आध्यात्मिक घटना नहीं, बल्कि मानव कल्याण, नवयुग के सूत्रपात, बुद्धि-विवेक आधारित वैचारिक जागरण तथा विश्व-बन्धुत्व और विश्व-शान्ति की स्थापना का दिव्य उद्घोष था।

चक्र धारण के पश्चात् ज्ञान और भक्ति की आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ जनकल्याण के लिए निष्काम कर्म साधना भी जुड़ गई, और युग परिवर्तन का शुभारम्भ हो गया। इसी क्रम में सन् 1992 में जगत्जननी माँ ने माँ बसन्ती को ध्यान में कहा — “तेरे बँगला बना दिया है” — जो ‘मणिद्वीप’ भवन के निर्माण का संकेत था।

माँ की आज्ञा से निर्मित साधना-स्थली

मणिद्वीप — जहाँ बैठना ही साधना है

ए-183, शास्त्री नगर, जोधपुर स्थित मणिद्वीप भवन
मणिद्वीप · ए-183, शास्त्री नगर, जोधपुर

भैया जी के चक्र धारण और जगत्जननी माँ की आज्ञा के पश्चात् सन् 1995 में ए-183, शास्त्री नगर में यह भवन बनकर तैयार हुआ। ‘माँ’ की आज्ञा से इसका नाम ‘मणिद्वीप’ रखा गया — जो आश्चर्यजनक रूप से ‘माँ’ के दिव्य लोक का ही नाम है। 10 जून 1995 को ‘माँ परिवार’ के सदस्य मनिहार भवन से मणिद्वीप आ गए।

यह आज्ञा इसलिए मिली क्योंकि जगत्जननी माँ स्वयं यहाँ विराजमान होकर भविष्य की गतिविधियों का संचालन करने वाली थीं — और विस्तृत कर्म साधना के लिए पर्याप्त स्थान आवश्यक था।

भैया जी से प्राप्त दृष्टि माँ बसन्ती के वात्सल्य और मधु माँ के समर्पित नेतृत्व के माध्यम से आज भी जीवित है — कार्य कभी रुका नहीं।

वात्सल्यमयी माँ बसन्ती मनिहार
वात्सल्यमयी · 2003–2021 तक नेतृत्व

माँ बसन्ती मनिहार (एम.ए., बी.एड.)

जन्म 28 सितम्बर 1942, जोधपुर। भैया जी की फुफेरी बहन, माँ बसन्ती उनके ज्ञान और साधना से प्रभावित होकर समस्त सुख-सुविधाएँ त्यागकर सन् 1964 में मनिहार भवन के एक छोटे-से 6×7 फुट के कमरे में माँ त्रिपुरसुन्दरी की साधना में लीन हो गईं। पूर्ण समर्पण और बालिकावत् निष्काम प्रेम से उन्होंने ‘माँ’ की असीम कृपा और दिव्य दर्शन प्राप्त किए — ‘माँ’ ने उन्हें अपनी लाडली पुत्री स्वीकार किया।

भैया जी के चैतन्यस्वरूप होने (2003) के पश्चात् उन्होंने समस्त आध्यात्मिक एवं सेवा कार्यों का नेतृत्व किया — अनेक ग्रंथों का प्रकाशन, तथा शिक्षा, संस्कार, महिला सशक्तिकरण, छात्रवृत्ति, निःशुल्क सद्साहित्य और खाद्यान्न सहायता का विस्तार। 7 मई 2021 को वे चैतन्यस्वरूप हुईं।

माँ बसन्ती का समर्पित जीवन पढ़ें
करुणामयी माँ मधुबाला अडवानी (मधु माँ)
करुणामयी · 2021 से वर्तमान नेतृत्व

माँ मधुबाला अडवानी (मनोविज्ञान में एम.ए.)

जन्म 1951, सिरसा (पंजाब), एक आधुनिक विचारों वाले परिवार में। स्वतंत्र चिंतन और तार्किक दृष्टि की धनी मधु माँ भैया जी और माँ बसन्ती के आध्यात्मिक स्वरूप से प्रभावित होते हुए भी अपने अनुभव को तर्क की कसौटी पर परखना चाहती थीं — इसीलिए उन्होंने मनोविज्ञान में एम.ए. किया। अन्ततः उनके विवेक ने उनकी आस्था को दृढ़ आधार दिया, और सन् 1970 में उन्होंने पूर्ण समर्पण भाव से यह मार्ग स्वीकार किया।

पाँच दशकों से अधिक की साधना के पश्चात्, भैया जी के दिव्य ज्ञान को ‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ के रूप में लिपिबद्ध करने का दायित्व भी उन्होंने निभाया। सन् 2021 से वे ‘मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ का नेतृत्व कर रही हैं — बुद्धि-विवेक योग साधना के प्रचार-प्रसार के साथ शिक्षा, संस्कार, छात्रवृत्ति, सद्साहित्य, योग और मानव सेवा को आगे बढ़ाते हुए।

मधु माँ का सेवा-पथ पढ़ें
निष्काम कर्म साधना

सेवा, जो स्वयं एक साधना है

सन् 1996 में जगत्जननी माँ की आज्ञा से भैया जी ने आध्यात्मिक साधना के साथ ‘कर्म साधना’ का शुभारम्भ किया — जिसमें कर्म केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि आत्म-विकास और लोकमंगल की साधना है। चार पंजीकृत लोक-न्यासों के माध्यम से शिक्षा, संस्कार और मानव कल्याण के कार्य निष्काम भाव से किए जाते हैं — किसी प्रतिफल की अपेक्षा के बिना।

छात्रवृत्ति सहयोग से जुड़े विद्यार्थी विद्यालय से उच्च शिक्षा तक

शिक्षा

जरूरतमंद छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति, पुस्तकें और सतत मार्गदर्शन, ताकि आर्थिक अभाव प्रतिभा के मार्ग में बाधा न बने।

₹6.72 करोड़+ छात्रवृत्ति · 1996 से
रविवारीय संस्कार कक्षा में बैठे विद्यार्थी जीवन-मूल्यों का विकास

संस्कार

रविवारीय कक्षाओं में आत्मविश्लेषण, विनम्रता, अनुशासन, कृतज्ञता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास, ताकि विद्यार्थी ज्ञान को जीवन से जोड़ सकें।

रविवार कक्षाएँ · व्यक्तित्व विकास
जरूरतमंद परिवारों के लिए खाद्यान्न सहायता निष्काम सेवा का व्यावहारिक रूप

सत्कर्म

खाद्यान्न सहायता, महिला स्वावलम्बन (सिलाई प्रशिक्षण) और जरूरतमंद परिवारों का सहयोग — गरिमा और आत्मनिर्भरता के साथ।

लगभग 300 परिवार · मासिक
निःशुल्क योग कक्षा में अभ्यास करते सहभागी आत्मिक उन्नति

साधना

निःशुल्क योग-प्राणायाम, ध्यान और दिव्य ज्ञान का स्वाध्याय — आंतरिक शान्ति, सकारात्मक दृष्टि और बुद्धि-विवेक की दिशा में।

योग · ध्यान · स्वाध्याय
सेवा का जीवंत प्रभाव

अनुकंपा, जो बदले हुए जीवन से मापी जाती है

कुछ यात्राएँ, जो समय पर मिले सहयोग से सम्भव हुईं —

नीतू देवड़ा

“समय पर मिला सहयोग शिक्षा को वह आधार बना देता है, जिस पर भविष्य फिर से खड़ा हो सकता है।”

नीतू देवड़ा सीनियर असिस्टेंट, भारतीय स्टेट बैंक, जोधपुर कक्षा 9 से एम.कॉम. तक शिक्षा सहयोग पूरी कहानी देखें →
डॉ. कुमुदिनी दाधीच

“कक्षा 10 में पढ़ाई छूटने की कगार से पीएच.डी. और शिक्षण तक की दूरी तय हो सकती है।”

डॉ. कुमुदिनी दाधीच रसायन विज्ञान व्याख्याता, राजस्थान शिक्षा विभाग कक्षा 6 से पीएच.डी. तक शिक्षा सहयोग पूरी कहानी देखें →
ज्योति सोनी

“सही मार्गदर्शन अंधकार के क्षण को जीवन के उद्देश्य में बदल सकता है।”

ज्योति सोनी चार्टर्ड अकाउंटेंट एवं कंपनी सेक्रेटरी कक्षा 12 के बाद शिक्षा, संस्कार एवं मार्गदर्शन पूरी कहानी देखें →

1996–2026 · ₹6.72 करोड़+ छात्रवृत्ति सहयोग · लगभग 300 परिवारों को मासिक खाद्यान्न सहायता · 30 वर्ष, अटूट। प्रत्येक वर्ष का लेखा-जोखा सार्वजनिक है।

दिव्य परंपरा एवं निरंतरता

ज्योति से ज्योति का शाश्वत प्रवाह

जोत से जोत जलाते चलो, प्रेम की धारा बहाते चलो….
संसार में हर व्यक्ति है दुःखी, सभी को सन्मार्ग दिखाते चलो…
ईश्वर की ओर सभी को बढ़ाते चलो…
— ‘मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ का प्रेरक मंत्र