माँ मधुबाला अडवानी
मधु माँ का जोधपुर आगमन, माँ बसन्ती जी से दिव्य भेंट, भैया जी के सान्निध्य में ज्ञान की जागृति और आज मणिद्वीप के कार्यों का करुणामय संचालन, सब एक अखण्ड आध्यात्मिक यात्रा के अध्याय हैं।
सिरसा, पंजाब
माँ बसन्ती जी से
जोधपुर
लिपिबद्ध किया
मिशन संचालन
जोधपुर आना स्वयं में एक बड़ा चमत्कार
माँ मधुबाला जी अडवानी का जोधपुर में आना स्वयं में एक बड़ा चमत्कार है। उनके पूर्वज विभाजन से पहले सिंध निवासी थे। रेलवे में इंजीनियर की नौकरी के कारण उनके पिताजी सिंध से स्थानांतरित होकर भारत आ गए।
पिताजी श्री जीवनलाल जी अडवानी और माताजी श्रीमती लक्ष्मी देवी की वे सबसे छोटी संतान हैं। आठ भाई-बहनों ने दो-दो वर्षों के अंतराल से वहीं जन्म लिया, लेकिन मधु माँ का जन्म 1951 में हिन्दुस्तान के पंजाब शहर सिरसा में हुआ।
अस्पताल में माँ बसन्ती जी से अनायास दिव्य भेंट
19 वर्षीय मधु माँ के जीवन का वह स्वर्णिम दिवस था, जब दैवी कृपा से उनकी आध्यात्मिक माँ, प्रथम मार्गदर्शिका और सद्गुरु माँ बसन्ती जी मनिहार से अस्पताल में अनायास भेंट हुई। दोनों अपनी-अपनी माताजी की देखभाल के लिए वहाँ रुकी हुई थीं।
अस्पताल में ही माँ बसन्ती जी ने मधु माँ का परिचय अपने आध्यात्मिक पथप्रदर्शक सद्गुरु श्री नन्दकिशोर जी शारदा, भैया जी, से करवाया। आगे चलकर माँ बसन्ती जी के संरक्षण में भैया जी उनके भी आध्यात्मिक पथप्रदर्शक बने।
ज्ञान प्राप्ति की ज्वाला हृदय में प्रज्वलित हुई
1971 में मधु माँ ने जोधपुर में एम.ए. साइकोलॉजी में प्रवेश लिया। ये दो वर्ष उनके आध्यात्मिक मार्ग के मील के पत्थर बने। वे लगभग नित्य ही कॉलेज से लौटते समय मनिहार भवन, सिद्धपीठ, में रुकतीं और माँ बसन्ती जी तथा भैया जी से आध्यात्मिक चिंतन और चर्चाएँ करती थीं।
उनके सभी संशयों के तर्कपूर्ण समाधान माँ बसन्ती जी और भैया जी से प्राप्त हो रहे थे। यही सत्य ज्ञान उनके आध्यात्मिक जीवन की नींव बना। संसार का कोई बड़ा प्रलोभन अब उन्हें आकर्षित नहीं कर सकता था; क्षणिक सुखों को त्याग कर शाश्वत ईश्वरीय प्रेम की प्राप्ति ही उनके जीवन का मूल उद्देश्य बन गया।
माँ बसन्ती जी की बेटी के रूप में हृदय से स्वीकार
युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर जी शारदा ने अपनी हस्तलिखित डायरी में माँ मधुबाला जी अडवानी के लिए विशेष पंक्तियाँ लिखीं। उसका भाव यह है कि भैया जी और चैतन्य जगत ने उन्हें माँ बसन्ती जी की बेटी के रूप में हृदय से स्वीकार कर लिया।
भैया जी के सान्निध्य में मधु माँ का संबंध केवल शिष्यत्व तक सीमित नहीं रहा; वह माँ बसन्ती जी के वात्सल्य, संरक्षण और चैतन्य परंपरा से जुड़ा एक आत्मीय आध्यात्मिक संबंध बन गया।— डायरी-भाव का सार
भैया जी और माँ बसन्ती जी के आशीर्वाद से फलित साधना
भैया जी ने मधु माँ से कठोर से कठोरतम साधनाएँ भी इतने सरल ढंग से करवाईं कि उन्हें अनुभव होता था मानो भैया जी स्वयं उन्हें पूर्ण करने की शक्तियाँ दे रहे हैं और आनन्द सहित अध्यात्म मार्ग पर आगे बढ़ा रहे हैं।
भैया जी ने उनसे कई महान चैतन्य शक्तियों की साधनाएँ करवाईं, उनसे आशीर्वाद प्राप्त करवाए, अनेक दिव्य अनुभूतियाँ करवाईं और माँ सरस्वती से साक्षात्कार भी करवाया। माँ बसन्ती जी ने उनसे निराकार परब्रह्म की साधना भी करवाई। पूर्ण मनोयोग से मधु माँ द्वारा की गई प्रत्येक साधना माँ-भैया जी के आशीर्वाद से फलित हुई।
भैया जी के अमृततुल्य ज्ञान को शब्द रूप देना
भैया श्री नन्दकिशोर जी शारदा द्वारा रचित दिव्य ग्रंथ “मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार” को लिपिबद्ध करने का दुर्लभ सौभाग्य मधु माँ को मिला। यह कार्य केवल लेखन नहीं था, बल्कि दिव्य ज्ञान को मानवता तक पहुँचाने की साधना थी।
भैया जी और माँ बसन्ती जी से प्राप्त ज्ञान और अनुभूतियों ने मधु माँ को भीतर से इतना परिपक्व बनाया कि उनका जीवन ज्ञान, साधना और सेवा की एक अविरल धारा बन गया।
जगत्जननी माँ, भैया जी और माँ बसन्ती जी के निर्देशानुसार सेवा
सन् 2021 में माँ बसन्ती जी के चैतन्य स्वरूप हो जाने पर मधु माँ जगत्जननी माँ, भैया जी और माँ बसन्ती जी के निर्देशानुसार अत्यंत सुचारू ढंग से सभी कार्यों का संचालन कर रही हैं।
इन कार्यों में सभी ट्रस्टों का संचालन, सद्साहित्य का प्रकाशन और वितरण, रविवारीय प्रातःकालीन कक्षाओं के माध्यम से बालिकाओं में शिक्षा, संस्कार और अध्यात्म का विकास, सायंकालीन आध्यात्मिक ज्ञान चर्चाओं से साधकों का मार्गदर्शन, जरूरतमंदों को खाद्यान्न वितरण, निःशुल्क योग कक्षाएँ और सिलाई केन्द्र का संचालन सम्मिलित हैं।
आनन्दमयी मुस्कान और स्नेहपूर्ण शिक्षण की धारा
करुणामयी मधु माँ ने जो ज्ञान भैया जी और माँ बसन्ती जी से सीखा और स्वयं धारण किया, उसी अनुभूत, दिव्य और अमृततुल्य ज्ञान का वे आज पूरी निष्ठा के साथ प्रचार-प्रसार कर रही हैं।
उनका सौम्य व्यक्तित्व, बाल-सुलभ सरलता, आनन्दमयी मुस्कान और करुणापूर्ण मधुर व्यवहार सहज ही सबको प्रेम से बाँध लेता है। वे गंभीर से गंभीर विषय को भी सरस बनाकर स्नेह से समझाती हैं, जिससे हृदय उनके ज्ञान की गहराई के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है।
ज्ञान, करुणा और सेवा का वर्तमान प्रवाह
मधु माँ आज भी भैया जी और माँ बसन्ती जी से प्राप्त दिव्य ज्ञान को जीवन में उतारकर साधकों, विद्यार्थियों और जरूरतमंदों के जीवन में आनन्द, शांति, खुशी और ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का संचार कर रही हैं।
उनकी उपस्थिति मणिद्वीप की वर्तमान धड़कन है, जहाँ ज्ञान केवल बताया नहीं जाता, बल्कि करुणा, संस्कार, सत्कर्म और आत्मीय मार्गदर्शन के रूप में जीया जाता है।
मधु माँ मणिद्वीप की जीवंत ज्ञानधारा को आगे बढ़ा रही हैं
भैया जी और माँ बसन्ती जी से प्राप्त दिव्य ज्ञान को वे सरलता, वात्सल्य और निष्ठा से जन-जन तक पहुँचा रही हैं।