बालिका शिक्षा और संस्कार

स्वामी विवेकानन्द स्टूडेन्ट्स वेलफेयर चैरिटेबल ट्रस्ट

धनाभाव से शिक्षा न रुके, शिक्षा संस्कार से जुड़े और बालिकाएँ आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य की ओर बढ़ें।

  • 1996स्थापना वर्ष
  • ₹6.14 करोड़+छात्रवृत्ति सहायता
  • 45विद्यालयों तक पहुँच
सेवा का आरम्भ

धनाभाव किसी बालिका के भविष्य में बाधा न बने

स्वामी विवेकानन्द ट्रस्ट की सेवा-यात्रा से जुड़ा दृश्य

लगभग तीन दशक पूर्व पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक कठिनाइयों के कारण अनेक बालिकाएँ शिक्षा से वंचित हो रही थीं। भैया श्री नन्दकिशोर जी शारदा ने अनुभव किया कि धनाभाव किसी भी बालिका की शिक्षा और भविष्य में बाधक नहीं बनना चाहिए तथा शिक्षा ही आत्मनिर्भरता और सामाजिक उन्नति का आधार है।

इसी विचार को साकार करने के लिए जगत्जननी माँ की आज्ञा से सुश्री बसन्ती जी मनिहार ने 10 जून 1996 को जोधपुर में इस ट्रस्ट की स्थापना की और भैया श्री नन्दकिशोर जी इसके अध्यक्ष बने।

कार्यपद्धति

छात्रवृत्ति — आवश्यकता और वास्तविक खर्च के आधार पर

छात्रवृत्ति वितरण का दृश्य

ट्रस्ट का मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्राओं को शिक्षा जारी रखने के लिए सहायता प्रदान करना था। भैया जी, माँ बसन्ती जी एवं मधु माँ ने इसे केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि माँ की साधना और मानव-सेवा का माध्यम माना।

छात्रवृत्ति अंकों के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक आवश्यकता, पारिवारिक परिस्थिति तथा विद्यालय की फीस को ध्यान में रखकर दी जाती है। चयन में जाति, धर्म या सम्प्रदाय का कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

ट्रस्ट को मिलने वाला सम्पूर्ण आर्थिक सहयोग बैंकों में सावधि जमा (एफ.डी.) के रूप में सुरक्षित रखा जाता है, और उस पर प्राप्त ब्याज की पूरी राशि छात्राओं में छात्रवृत्ति के रूप में वितरित की जाती है। टेलीफोन, डाक, स्टेशनरी और आवागमन जैसे प्रशासनिक खर्च ट्रस्ट के सदस्य व्यक्तिगत रूप से वहन करते हैं, ताकि उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम लाभ विद्यार्थियों तक पहुँचे।

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के मूल मंत्र पर आधारित यह सेवा शिक्षा को सामाजिक समानता और राष्ट्र-निर्माण का माध्यम मानती है।

तीन संकल्प

शिक्षा के साथ दिशा, श्रद्धा और योगदान का भाव

छात्राओं को आगे बढ़ने के लिए तीन सरल पर गहरे संकल्प दिए जाते हैं, ताकि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि न रहकर जीवन-दृष्टि बन सके।

इष्टदेव का स्मरण

अपने इष्टदेव पर निःस्वार्थ भाव से विश्वास रखते हुए उनका नित्य स्मरण करना।

लक्ष्य की ओर एकाग्रता

अपने लक्ष्य की ओर एकनिष्ठ एकाग्रता से बढ़ना और संघर्ष में धैर्य बनाए रखना।

ज्ञान-यज्ञ में योगदान

समर्थ बनकर इस ज्ञान-यज्ञ में अपना योगदान देना और आगे किसी और के लिए प्रकाश बनना।

संस्कार निर्माण

आत्मविश्वासी और सुसंस्कारित व्यक्तित्व की दिशा

संस्कार एवं व्यक्तित्व विकास कक्षाएँ

शिक्षा के साथ संस्कार-निर्माण को ट्रस्ट की कार्यपद्धति का अभिन्न अंग बनाया गया। उद्देश्य था कि छात्राओं में आत्मविश्वास, विनम्रता, संघर्षशीलता, कर्तव्यबोध, निःस्वार्थ सेवा-भाव और आध्यात्मिक चेतना का विकास हो।

छात्राओं को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक बनाया जाता है — जैसे प्रकृति के संसाधनों पर सबका समान अधिकार, और प्रकृति के प्रति प्रेम एवं आदर का भाव। मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पहलुओं के इसी सकारात्मक समन्वय से वे केवल शिक्षित नहीं, बल्कि सुसंस्कारित, संतुलित और उत्तरदायी व्यक्तित्व के रूप में आगे बढ़ती हैं।

संस्कार कक्षाओं के बारे में पढ़ें
सेवा का विस्तार

विद्यालयों से हजारों छात्राओं तक

1996 में जरूरतमंद बालिकाओं से प्रारम्भ हुआ यह प्रयास आज शिक्षा, अवसर, आत्मविश्वास और आशा का व्यापक आधार बन चुका है।

₹6.14 करोड़+स्थापना से अब तक छात्रवृत्ति राशि (माँ शारदामणि ट्रस्ट सहित)
38 + 7जोधपुर और बालोतरा के विद्यालय
32महाविद्यालय, जिनके माध्यम से उच्च शिक्षा सहयोग
शिक्षा से राष्ट्र-निर्माण तक

एक बालिका की शिक्षा, अनेक पीढ़ियों के भविष्य का उजाला

ट्रस्ट शिक्षा को आत्मनिर्भरता, संस्कार, सामाजिक समानता और राष्ट्र-निर्माण का माध्यम मानता है। यह सेवा-धारा आज हजारों छात्राओं के जीवन में विश्वास और संभावना का आधार बन चुकी है।

पंजीकरण एवं पारदर्शिता

यह ट्रस्ट आयकर अधिनियम की धारा 12A एवं 80G के अंतर्गत पंजीकृत है। पंजीकरण दस्तावेज़, स्थापना-वर्ष से वर्ष-वार अंकेक्षित वित्तीय प्रतिवेदन, छात्रवृत्ति प्रमाण-पत्र और शिक्षकों से प्राप्त आभार-पत्र — सभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।

दस्तावेज़ देखें