जगतजननी माँ प्रदत्त दिव्य ज्ञान

मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार

भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने जगतजननी माँ को गुरु बनाकर जो दिव्य ज्ञान प्राप्त किया, उसे माँ की आज्ञा से मानव कल्याण हेतु इस अमृततुल्य ग्रंथ में लिपिबद्ध करवाया।

लिपिबद्ध होने की यात्रा

भूतनाथ मंदिर के पास वृक्ष के नीचे प्रवाहित ज्ञान

वृक्ष के नीचे बैठे भैया जी पाण्डुलिपि के पन्ने देखते हुए
‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ दिव्य पुस्तक लिपिबद्ध करवाते हुए श्री नन्दकिशोर जी शारदा

भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने जगतजननी माँ को गुरु बनाकर उनसे जीवनभर जो दिव्य ज्ञान अर्जित किया, उसे जगतजननी माँ-बाबूजी के दिव्य मिशन के अंतर्गत मई 2002 से दिव्य पुस्तक मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार के रूप में लिपिबद्ध करवाने का कार्य प्रारम्भ हुआ। यह ज्ञान भैया जी को कैसे प्राप्त हुआ, इसकी पूरी साधना-यात्रा यहाँ पढ़ें →

यद्यपि ग्रंथ का औपचारिक लेखन मई 2002 में माँ की आज्ञा मिलने पर प्रारम्भ हुआ, इस विषय पर भैया जी का चिंतन-मनन वर्षों पहले से चल रहा था। जब भी उन्हें मानसिक अवकाश मिलता, वे इसी विषय की चर्चा करने लगते — यह मानो उनकी सम्पूर्ण आध्यात्मिक साधना का केन्द्रबिन्दु ही था।

दिव्य ज्ञान को लिपिबद्ध करने का भावपूर्ण दृश्य
‘दिव्य पुस्तक लिपिबद्ध करती हुई सुश्री मधु जी अडवानी

भैया जी इस पुस्तक को भूतनाथ मंदिर के पास एक वृक्ष के नीचे बैठकर लिपिबद्ध करवाते थे। भैया जी और मधु माँ वहाँ जाते, अलग अलग वृक्ष के नीचे ध्यान लगाते, भैया जी ध्यानमग्न हो जाते और चैतन्य जगत् से उनका सम्पर्क जुड़ जाता। फिर वे धाराप्रवाह बोलते, जिसे मधु माँ लिख लेतीं। उस समय उनका मुख दिव्य आभा से युक्त हो जाता था।

यह ग्रंथ आज की वैज्ञानिक और भौतिक चकाचौंध से भ्रमित पीढ़ी को सही मार्गदर्शन देने वाली एक दिव्य कृति है।
ग्रंथ का दिव्य दर्शन

विज्ञान के आधार पर अध्यात्म का गहन प्रतिपादन

मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार पुस्तक का आवरण
विज्ञान की सीमाओं से परे चैतन्य जगत् के रहस्यों का समग्र प्रस्तुतीकरण।

इस पुस्तक में अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा ने माँ त्रिपुरसुन्दरी को गुरु मानकर प्राप्त दिव्य ज्ञान और अपने अनुभवों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। इसमें ब्रह्माण्ड की संरचना, सृष्टि की उत्पत्ति, प्रकृति, दिव्य लोकों की रचना, ईश्वर की सत्ता, मानव-जीवन का उद्देश्य और चैतन्य शक्ति जैसे विषयों को समग्र रूप से समझाया गया है।

विज्ञान और अध्यात्म पर अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, परन्तु उनके रचयिता प्रायः या तो वैज्ञानिक रहे या दार्शनिक। भैया जी उन विरल रचनाकारों में से थे जिनकी सोच विज्ञान-आधारित होते हुए भी वे स्वयं उच्चतम कोटि के दार्शनिक थे — माँ की कृपा से जिन्होंने दिव्य लोकों का स्वयं अनुभव किया।

ब्रह्म-कणों, भौतिक और चैतन्य शरीर की अवधारणा, देवी-देवताओं के लोक, देवदूतों के अस्तित्व और चैतन्य जगत् के अनेक रहस्यों को भी उजागर किया गया है। यह ज्ञान व्यक्ति में ईश्वर और चैतन्य शक्ति के प्रति दृढ़ श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करता है।

यह समझने में सहायता मिलती है कि भौतिक सुख-सुविधाएँ जीवन के लिए आवश्यक हैं, किंतु मानव-जीवन का वास्तविक लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर की प्राप्ति है।

भैया जी की यह दिव्य कृति मानवता के लिए अमृततुल्य अलौकिक देन है। ब्रह्माण्ड के रहस्यों की जिज्ञासा रखने वालों के लिए यह एक मौलिक संदर्भ ग्रंथ है।
पुस्तक की विषय-वस्तु

एक अध्यायवार परिचय

मृत्यु के बाद क्या? — इस अनादि प्रश्न पर विज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन की समवेत खोज।

प्रथम अध्याय

मृत्यु और मानव-जन्म का प्रश्न

पूर्वजों, संतों और विज्ञान के मृत्यु सम्बन्धी चिंतन के आधार पर यह प्रश्न उठता है कि मानव शिशु जन्म के समय निर्भर होते हुए भी आगे चलकर विवेकानन्द, आइन्स्टाइन या विपरीत दिशा में जाने वाला व्यक्ति कैसे बनता है।

द्वितीय अध्याय

विज्ञान की आधारशिला

विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्तों को सरल भाषा में समझाते हुए दिव्य लोकों के सम्भावित स्थानों और अध्यात्म की वैज्ञानिक भूमिका पर चर्चा की गई है।

तृतीय अध्याय

भौतिक और चैतन्य कण

भौतिक जगत् और चैतन्य जगत् के मूल कणों के गुण-धर्म तथा उनके स्वाभाविक अन्तर के आधार पर परब्रह्म परमात्मा को विज्ञान से प्रतिपादित करने का प्रयास है।

चतुर्थ अध्याय

प्रकाश, प्रकृति और दर्शन

प्रकाश के विशेष गुणों द्वारा प्रकृति की लीला समझाते हुए वस्तु और उसके आभासित प्रतिबिम्ब का रहस्य तथा स्वामी विवेकानन्द को माँ काली के दर्शन की सम्भावना पर चिंतन है।

पंचम अध्याय

मृत्यु के बाद की स्थिति

जब मनुष्य पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से विलग होता है, तब उसकी स्थिति, वह पृथ्वी पर क्या छोड़ जाता है और उसका स्वरूप क्या होता है, इस पर विचार किया गया है।

षष्ठ अध्याय

दिव्य लोकों की रचना

विज्ञान की अंतिम सीमा प्लांक काल के पूर्व क्या था, इस रहस्य के साथ दिव्य लोकों और दैविक चैतन्य शरीरों के निर्माण की प्रक्रिया समझाने का प्रयास है।

सप्तम अध्याय

जिज्ञासाओं का समाधान

पूर्व अध्यायों के ज्ञान के आधार पर पाठकों के मन में उठने वाले सम्भावित प्रश्नों का निराकरण किया गया है, ताकि अध्ययन चिंतन और मनन में परिवर्तित हो सके।

ज्ञान गंगा

संकल्प से साकार तक

मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार के विमोचन समारोह का दृश्य
“अगर यह दैवीयदत्त ज्ञान पृथ्वी पर आ गया तो चारों तरफ आनन्द ही आनन्द हो जायेगा।” - युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा

सन् 2002 के अंत तक भैया श्री नन्दकिशोर शारदा द्वारा माँ से प्राप्त दिव्य ज्ञान पर आधारित ग्रंथ का लेखन-कार्य पूर्ण हो चुका था। उनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि यह ज्ञान किसी एक ग्रंथ तक सीमित न रहकर जन-जन तक पहुँचे और मानवता को शाश्वत सत्य की ओर उन्मुख करे ताकि मनुष्य अपने जीवन लेने के उद्देश्य को पूर्ण कर सके। ‘आनन्द ही आनन्द’ फैलाने की यही भावना लिए वे 24 जनवरी 2003, विवेकानन्द जयंती (माघ कृष्ण सप्तमी) के पावन दिवस को चैतन्यस्वरूप हो गये — यह ग्रंथ उनकी अमर कीर्ति का जीवंत स्मारक है।

इसी पवित्र भावना से उन्होंने ज्ञान गंगा मिशन की परिकल्पना की थी। भैया जी के चैतन्य स्वरूप होने के पश्चात माँ बसन्ती जी ने इस संकल्प को आगे बढ़ाया और अप्रैल 2003 में श्री नन्दकिशोर शारदा ज्ञान गंगा मिशन की स्थापना की। इसी मिशन के माध्यम से नवम्बर 2003 में इस दिव्य ग्रंथ का प्रकाशन हुआ।

मई 2002

दिव्य ज्ञान को लिपिबद्ध करवाने का कार्य प्रारम्भ हुआ।

अप्रैल 2003

माँ बसन्ती जी द्वारा ज्ञान गंगा मिशन की स्थापना हुई।

नवम्बर 2003

ग्रंथ का प्रकाशन और नि:शुल्क वितरण आरम्भ हुआ और ज्ञान जन-जन तक पहुँचने लगा।

दिव्य ज्ञान का प्रभाव

संशय से श्रद्धा और आत्मबोध की ओर

पुस्तक में निहित दिव्य ज्ञान ने अनेक व्यक्तियों के जीवन को नई दिशा, दृष्टि और सार्थकता प्रदान की है। इसके अध्ययन से हजारों लोगों ने मानव-जीवन के उद्देश्य, ईश्वर की सत्ता और चैतन्य शक्ति के स्वरूप को समझने का प्रयास किया।

इस ज्ञान ने अनेक जिज्ञासुओं के संशयों और आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान किया। ईश्वर के अस्तित्व के प्रति संशय रखने वाले कई व्यक्ति भी इसके प्रभाव से आस्था की ओर प्रवृत्त हुए और अपने जीवन को आध्यात्मिक मूल्यों के अनुरूप ढालने लगे।

यह पुस्तक केवल जानकारी नहीं देती; यह पाठक को प्रश्न करने, चिंतन करने और आत्मबोध की ओर चलने का आह्वान करती है।
विद्वत् समुदाय की सराहना

विद्वानों की दृष्टि में

न्यायपालिका, विश्वविद्यालयों और शिक्षा-जगत के विद्वानों की पढ़ी-परखी प्रतिक्रियाएँ।

“श्री नन्दकिशोर शारदा ने स्वयं के चिन्तन के साथ विषय का गहन अध्ययन किया है व विचारों को सशक्त भाषा में प्रस्तुत कर इस विषय पर अपने अमिट हस्ताक्षर किये हैं।”
न्यायाधिपति प्रकाश टाटिया
“फिर भी इस पुस्तक के लेखक, जो स्वयं एक साधक और आध्यात्मिक चिन्तक होने के साथ-साथ एक वैज्ञानिक भी रहे, ने इस विषय में जाँच-पड़ताल के नये आयाम अवश्य खोले हैं।”
प्रो. राम हर्ष सिंह
“इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि श्री शारदाजी ने माँ का वर्षों तक चिन्तन करके अपने ज्ञान से जो आध्यात्मिक विचार लिखे हैं वे सत्य हैं।”
डॉ. अमरसिंह फरोदा
“दर्शन शास्त्र और विज्ञान का जो समन्वय किया गया है, वह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग है।”
प्रो. (डॉ.) वी. के. भन्साली
“अध्यात्म और विज्ञान पर आधारित यह खोजपूर्ण अनूठी पुस्तक आपका पथ भी आलोकित करे, कल्याण करे।”
प्रो. (डॉ.) रामगोपाल राव