मृत्यु और मानव-जन्म का प्रश्न
पूर्वजों, संतों और विज्ञान के मृत्यु सम्बन्धी चिंतन के आधार पर यह प्रश्न उठता है कि मानव शिशु जन्म के समय निर्भर होते हुए भी आगे चलकर विवेकानन्द, आइन्स्टाइन या विपरीत दिशा में जाने वाला व्यक्ति कैसे बनता है।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने जगतजननी माँ को गुरु बनाकर जो दिव्य ज्ञान प्राप्त किया, उसे माँ की आज्ञा से मानव कल्याण हेतु इस अमृततुल्य ग्रंथ में लिपिबद्ध करवाया।
भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने जगतजननी माँ को गुरु बनाकर उनसे जीवनभर जो दिव्य ज्ञान अर्जित किया, उसे जगतजननी माँ-बाबूजी के दिव्य मिशन के अंतर्गत मई 2002 से दिव्य पुस्तक मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार के रूप में लिपिबद्ध करवाने का कार्य प्रारम्भ हुआ। यह ज्ञान भैया जी को कैसे प्राप्त हुआ, इसकी पूरी साधना-यात्रा यहाँ पढ़ें →
यद्यपि ग्रंथ का औपचारिक लेखन मई 2002 में माँ की आज्ञा मिलने पर प्रारम्भ हुआ, इस विषय पर भैया जी का चिंतन-मनन वर्षों पहले से चल रहा था। जब भी उन्हें मानसिक अवकाश मिलता, वे इसी विषय की चर्चा करने लगते — यह मानो उनकी सम्पूर्ण आध्यात्मिक साधना का केन्द्रबिन्दु ही था।
भैया जी इस पुस्तक को भूतनाथ मंदिर के पास एक वृक्ष के नीचे बैठकर लिपिबद्ध करवाते थे। भैया जी और मधु माँ वहाँ जाते, अलग अलग वृक्ष के नीचे ध्यान लगाते, भैया जी ध्यानमग्न हो जाते और चैतन्य जगत् से उनका सम्पर्क जुड़ जाता। फिर वे धाराप्रवाह बोलते, जिसे मधु माँ लिख लेतीं। उस समय उनका मुख दिव्य आभा से युक्त हो जाता था।
इस पुस्तक में अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा ने माँ त्रिपुरसुन्दरी को गुरु मानकर प्राप्त दिव्य ज्ञान और अपने अनुभवों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। इसमें ब्रह्माण्ड की संरचना, सृष्टि की उत्पत्ति, प्रकृति, दिव्य लोकों की रचना, ईश्वर की सत्ता, मानव-जीवन का उद्देश्य और चैतन्य शक्ति जैसे विषयों को समग्र रूप से समझाया गया है।
विज्ञान और अध्यात्म पर अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, परन्तु उनके रचयिता प्रायः या तो वैज्ञानिक रहे या दार्शनिक। भैया जी उन विरल रचनाकारों में से थे जिनकी सोच विज्ञान-आधारित होते हुए भी वे स्वयं उच्चतम कोटि के दार्शनिक थे — माँ की कृपा से जिन्होंने दिव्य लोकों का स्वयं अनुभव किया।
ब्रह्म-कणों, भौतिक और चैतन्य शरीर की अवधारणा, देवी-देवताओं के लोक, देवदूतों के अस्तित्व और चैतन्य जगत् के अनेक रहस्यों को भी उजागर किया गया है। यह ज्ञान व्यक्ति में ईश्वर और चैतन्य शक्ति के प्रति दृढ़ श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करता है।
यह समझने में सहायता मिलती है कि भौतिक सुख-सुविधाएँ जीवन के लिए आवश्यक हैं, किंतु मानव-जीवन का वास्तविक लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर की प्राप्ति है।
भैया जी की यह दिव्य कृति मानवता के लिए अमृततुल्य अलौकिक देन है। ब्रह्माण्ड के रहस्यों की जिज्ञासा रखने वालों के लिए यह एक मौलिक संदर्भ ग्रंथ है।
मृत्यु के बाद क्या? — इस अनादि प्रश्न पर विज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन की समवेत खोज।
पूर्वजों, संतों और विज्ञान के मृत्यु सम्बन्धी चिंतन के आधार पर यह प्रश्न उठता है कि मानव शिशु जन्म के समय निर्भर होते हुए भी आगे चलकर विवेकानन्द, आइन्स्टाइन या विपरीत दिशा में जाने वाला व्यक्ति कैसे बनता है।
विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्तों को सरल भाषा में समझाते हुए दिव्य लोकों के सम्भावित स्थानों और अध्यात्म की वैज्ञानिक भूमिका पर चर्चा की गई है।
भौतिक जगत् और चैतन्य जगत् के मूल कणों के गुण-धर्म तथा उनके स्वाभाविक अन्तर के आधार पर परब्रह्म परमात्मा को विज्ञान से प्रतिपादित करने का प्रयास है।
प्रकाश के विशेष गुणों द्वारा प्रकृति की लीला समझाते हुए वस्तु और उसके आभासित प्रतिबिम्ब का रहस्य तथा स्वामी विवेकानन्द को माँ काली के दर्शन की सम्भावना पर चिंतन है।
जब मनुष्य पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से विलग होता है, तब उसकी स्थिति, वह पृथ्वी पर क्या छोड़ जाता है और उसका स्वरूप क्या होता है, इस पर विचार किया गया है।
विज्ञान की अंतिम सीमा प्लांक काल के पूर्व क्या था, इस रहस्य के साथ दिव्य लोकों और दैविक चैतन्य शरीरों के निर्माण की प्रक्रिया समझाने का प्रयास है।
पूर्व अध्यायों के ज्ञान के आधार पर पाठकों के मन में उठने वाले सम्भावित प्रश्नों का निराकरण किया गया है, ताकि अध्ययन चिंतन और मनन में परिवर्तित हो सके।
सन् 2002 के अंत तक भैया श्री नन्दकिशोर शारदा द्वारा माँ से प्राप्त दिव्य ज्ञान पर आधारित ग्रंथ का लेखन-कार्य पूर्ण हो चुका था। उनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि यह ज्ञान किसी एक ग्रंथ तक सीमित न रहकर जन-जन तक पहुँचे और मानवता को शाश्वत सत्य की ओर उन्मुख करे ताकि मनुष्य अपने जीवन लेने के उद्देश्य को पूर्ण कर सके। ‘आनन्द ही आनन्द’ फैलाने की यही भावना लिए वे 24 जनवरी 2003, विवेकानन्द जयंती (माघ कृष्ण सप्तमी) के पावन दिवस को चैतन्यस्वरूप हो गये — यह ग्रंथ उनकी अमर कीर्ति का जीवंत स्मारक है।
इसी पवित्र भावना से उन्होंने ज्ञान गंगा मिशन की परिकल्पना की थी। भैया जी के चैतन्य स्वरूप होने के पश्चात माँ बसन्ती जी ने इस संकल्प को आगे बढ़ाया और अप्रैल 2003 में श्री नन्दकिशोर शारदा ज्ञान गंगा मिशन की स्थापना की। इसी मिशन के माध्यम से नवम्बर 2003 में इस दिव्य ग्रंथ का प्रकाशन हुआ।
दिव्य ज्ञान को लिपिबद्ध करवाने का कार्य प्रारम्भ हुआ।
माँ बसन्ती जी द्वारा ज्ञान गंगा मिशन की स्थापना हुई।
ग्रंथ का प्रकाशन और नि:शुल्क वितरण आरम्भ हुआ और ज्ञान जन-जन तक पहुँचने लगा।
पुस्तक में निहित दिव्य ज्ञान ने अनेक व्यक्तियों के जीवन को नई दिशा, दृष्टि और सार्थकता प्रदान की है। इसके अध्ययन से हजारों लोगों ने मानव-जीवन के उद्देश्य, ईश्वर की सत्ता और चैतन्य शक्ति के स्वरूप को समझने का प्रयास किया।
इस ज्ञान ने अनेक जिज्ञासुओं के संशयों और आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान किया। ईश्वर के अस्तित्व के प्रति संशय रखने वाले कई व्यक्ति भी इसके प्रभाव से आस्था की ओर प्रवृत्त हुए और अपने जीवन को आध्यात्मिक मूल्यों के अनुरूप ढालने लगे।
न्यायपालिका, विश्वविद्यालयों और शिक्षा-जगत के विद्वानों की पढ़ी-परखी प्रतिक्रियाएँ।
“श्री नन्दकिशोर शारदा ने स्वयं के चिन्तन के साथ विषय का गहन अध्ययन किया है व विचारों को सशक्त भाषा में प्रस्तुत कर इस विषय पर अपने अमिट हस्ताक्षर किये हैं।”
एक अनुत्तरित प्रश्न "मृत्यु के बाद क्या है" की खोज में विज्ञान द्वारा खोज करने के प्रयत्न किये जाते रहे और उससे पूर्व कई प्रतिभाओं और साधु-संतों द्वारा मनुष्य की जिज्ञासा शांत करने के प्रयत्न भी किये गये हैं परन्तु मानव मन को संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई है। खोज का यह कार्य निरन्तर जारी है। इसी संदर्भ में दिये गये उत्तर सम्पूर्ण सत्य है या इस सम्बन्ध में प्रकट किये गये विचार सत्य की राह दर्शाने मार्ग ही है — मानव मन अभी भ्रमित ही है।
मृत्यु के बाद क्या है, के इस प्रश्न के साथ में कृष्ण विवर (Black Hole) और सृष्टि की रचना के साथ ईश्वर के अस्तित्व व ईश्वर के निवास जैसे जटिल विषय पर श्री नन्दकिशोर शारदा द्वारा "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार" पुस्तक में किया गया अनुसंधान एक अपना ही प्रभाव छोड़ने वाला प्रयत्न है। इस जटिल विषय पर जिस सशक्त तरीके से श्री नन्दकिशोर शारदा ने प्रस्तुति की है वह बहुत कुछ सोचने के लिये विवश कर देती है।
श्री शारदाजी ने शरीर, शरीर में शक्ति की उत्पत्ति होना, सजीव में भावना होना, भावना का कोई रंग, रूप, भार नहीं होना, जीवित प्राणी के भौतिक भार व उसी व्यक्ति का निर्जीव शरीर के भार में कोई कमी नहीं होना परन्तु, निर्जीव में शक्ति का समाप्त हो जाना, अनगिनत ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का अच्छा प्रयास किया है। इन प्रश्नों के घने जंगल में से कौनसा रास्ता चुनें? हर रास्ते की सच्चाई पर अकाट्य तर्क के बावजूद सम्पूर्ण सुख, निरोगी काया और डर से छुटकारा प्राप्त करने की तीव्र इच्छा में मानव ने पृथ्वी के बाहर भी कदम रख लिये हैं परन्तु स्वयं के भीतर प्रवेश कर स्वयं की सच्चाई को जानने में कितना सफल रहा है?
मृत्यु के बाद क्या है प्रश्न का उत्तर ढूँढने वालों और कृष्ण-विवर में क्या है जानने में प्रयत्नशीलों को नास्तिकों ने उनकी आस्था को भी चुनौती दी है। आस्तिकों ने हार मानी है न नास्तिकों ने हार मानी है, पुनः मानव भ्रमित है।
श्री नन्दकिशोर शारदा का मेरा बहुत संक्षेप परन्तु उनका प्रभावी परिचय रहा है। उनकी इस पुस्तक "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार" के अध्ययन से पता चलता है कि श्री नन्दकिशोर शारदा ने स्वयं के चिन्तन के साथ विषय का गहन अध्ययन किया है व विचारों को सशक्त भाषा में प्रस्तुत कर इस विषय पर अपने अमिट हस्ताक्षर किये हैं।
श्री नन्दकिशोर शारदा द्वारा अपने अल्प जीवनकाल में बालिकाओं की शिक्षा हेतु अत्यंत सराहनीय कार्य किया है जिसकी यह विशेषता रही है कि दानदाताओं की सम्पूर्ण राशि सुरक्षित रखते हुए बालिका के अध्ययन का प्रावधान उसकी ब्याज की आमदनी से किया जावे। दानदाताओं की उपरोक्त राशि किसी अन्य कार्य में खर्च नहीं की जावे। इस कार्य द्वारा उन्होंने न सिर्फ दानदाताओं का विश्वास प्राप्त किया बल्कि नारी उत्थान के लिये एक सुदृढ़ नींव भी रखी। उनके असामयिक निधन से अपूर्णीय क्षति हुई है लेकिन उनके सहयोगियों द्वारा इस कार्य को जारी रखा जा रहा है। इसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं।
“फिर भी इस पुस्तक के लेखक, जो स्वयं एक साधक और आध्यात्मिक चिन्तक होने के साथ-साथ एक वैज्ञानिक भी रहे, ने इस विषय में जाँच-पड़ताल के नये आयाम अवश्य खोले हैं।”
मैंने पुस्तक "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार" (Wonderful World After Death) कई बार पढ़ी है और इस अत्यंत सूक्ष्म विषय पर नया प्रकाश डालने के इस प्रयास की सराहना करता हूँ। मुझे एक से अधिक बार "मणिद्वीप" परिवार में जाने और आदरणीया बसन्तीजी से ज्ञानवर्धक संवाद करने का अवसर भी मिला। इन सबसे मेरे आध्यात्मिक स्तर में निश्चित रूप से वृद्धि हुई है।
श्री नन्दकिशोर द्वारा रचित यह पुस्तक, जो एक सुपरिचित साधक और चिन्तक हैं, भारतीय अध्यात्म में गम्भीर वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि वाली एक रोचक पुस्तिका है। यह पुस्तक परम्परागत अध्यात्म और समकालीन विज्ञान के व्यापक ढाँचे में मृत्यु और मृत्यु के बाद के जीवन के अत्यंत सूक्ष्म विषय की पड़ताल करने का प्रयास करती है। जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म को लेकर शास्त्रों में परस्पर विरोधाभासी मान्यताओं तथा कर्म-सिद्धान्त के एक अनूठे समन्वय के कारण यह विषय सहज ही समझ में आने वाला नहीं है।
उपनिषद और बुद्ध द्वारा मनुष्य के वास्तविक स्वरूप तथा बाह्य सत्य के विषय में पहुँचे गये दार्शनिक निष्कर्ष भिन्न-भिन्न हैं। उपनिषद एक शाश्वत, स्थायी आत्मा अथवा 'आत्मन्' तथा एक विश्व-व्यापी आत्मा अर्थात् 'ब्रह्म' के अस्तित्व में विश्वास करता है। बुद्ध इन्हें नकारते हैं। किन्तु दोनों ही सम्प्रदाय मानव-दुःख के एकमात्र कारण — अर्थात् अज्ञान या अविद्या — में विश्वास करते हैं। आध्यात्मिक उपलब्धि सांसारिक जीवन से परे जाने की माँग करती है, और मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष अथवा निर्वाण है।
इस प्रकार भारतीय अध्यात्म जीवन की निरंतरता को "आत्मा" मानता है, और इस अर्थ में "मृत्यु" कोई वास्तविक सत्ता नहीं, वह केवल स्थूल शरीर से सम्बन्धित है। किन्तु प्राचीन जीवन-विज्ञान सूक्ष्म शरीर की अवधारणा प्रस्तुत करता है, जो ऊर्जा के अठारह घटकों — पाँच तन्मात्राएँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहंकार — से निर्मित है। यह सूक्ष्म शरीर ही है जो मृत्यु के पश्चात् पूर्वजन्म के कर्मों और संस्कारों के आवरण सहित एक स्थूल शरीर से दूसरे स्थूल शरीर में स्थानान्तरित होता है। वास्तविक अर्थ में आत्मा सूक्ष्म शरीर का अभिन्न अंग नहीं है, किन्तु एक निरपेक्ष तत्व के रूप में उसकी उपस्थिति ही इन सब घटनाओं को सम्भव बनाती है। इस प्रकार तथाकथित "मृत्यु के बाद के अलौकिक संसार" की प्रकृति प्रत्येक मामले में सूक्ष्म शरीर, संक्रमणशील कर्मों और संस्कारों के गुणों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।
यह सम्पूर्ण विषय बौद्धिक दृष्टि से समझना कठिन प्रतीत होता है। हमारी बुद्धि बाह्य जगत को देखने और समझने के लिये बनी है, वह आत्मा और ब्रह्म रूपी आंतरिक जगत के रहस्य को समझने में उतनी सक्षम नहीं है। फिर भी इस पुस्तक के लेखक, जो स्वयं एक साधक और आध्यात्मिक चिन्तक होने के साथ-साथ एक वैज्ञानिक भी रहे, ने इस विषय में जाँच-पड़ताल के नये आयाम अवश्य खोले हैं।
मूल प्रतिक्रिया अंग्रेज़ी में; ऊपर भावानुवाद प्रस्तुत है।
“इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि श्री शारदाजी ने माँ का वर्षों तक चिन्तन करके अपने ज्ञान से जो आध्यात्मिक विचार लिखे हैं वे सत्य हैं।”
श्री नन्दकिशोर शारदा द्वारा लिखित "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार" पुस्तक का मैंने कई बार अध्ययन किया है। इस पुस्तक में कुल सात अध्याय हैं। लेखक ने इन सात अध्यायों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के विभिन्न पहलुओं जैसे पूर्वजों, संतो एवं अध्यात्म प्रवर्तकों ने जो ब्रह्माण्ड एवं मृत्यु के बाद आत्मा पर चिन्तन किया है तथा वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड पर जो अब तक खोज का उनका विस्तार से वर्णन किया है।
इस पुस्तक में आध्यात्मिक पहलुओं पर विचार श्री नन्दकिशोर शारदा जी की माँ त्रिपुर सुन्दरी की कई सालों की तपस्या एवं गहन चिन्तन पर जो शारदा जी ने ज्ञान ग्रहण किया था, उस पर आधारित है। लेखक ने अपने द्वारा अर्जित आध्यात्मिक ज्ञान को आधार मान कर इस पुस्तक में लिखा है कि मनुष्य पृथ्वी पर बाकी अन्य प्राणियों से बिल्कुल भिन्न है। एक ओर जहाँ पृथ्वी पर मनुष्य के अलावा सभी छोटे-बड़े प्राणी आनुवंशिकता के नियमों के अन्तर्गत जन्मते ही अपने सभी कार्य-कलाप करने में स्वयं ही सक्षम होते हैं। इनकी आत्मा अजर-अमर नहीं होती तथा मृत्यु के पश्चात् यह सब प्राणी नष्ट हो जाते हैं, दूसरी ओर मनुष्य की आत्मा अजर-अमर है तथा वह परमात्मा का अंश है। मनुष्य की मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा शरीर से निकल कर अपने कर्मों के अनुसार दैवलोक, शिवलोक, विष्णुलोक, ब्रह्मलोक अथवा प्रेतलोक में जाती है तथा कर्मफलों को भोगने पर फिर से जन्म लेती है। मनुष्य का भौतिक शरीर जो पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश का बना होता है, उन्हीं में लीन हो जाता है। इस पुस्तक में यह भी लिखा है कि आत्मा जब मनुष्य शरीर से चैतन्य स्वरूप ज्योति के रूप में बाहर निकलती है तो इसे सामान्य आँखों से नहीं देखा जा सकता। इस चैतन्य स्वरूप ज्योति को देखने के लिये दिव्य दृष्टि चाहिये जो साधारण मनुष्य के पास नहीं है। यह दिव्य दृष्टि ऋषियों, संतों-साधुओं द्वारा घोर तपस्या के पश्चात् ही प्राप्त होती है।
इस पुस्तक में यह भी लिखा है कि सम्पूर्ण जगत का निर्माण एक निराकार, अनन्त शक्तिशाली, अजर-अमर महाशक्ति ने किया है जिसे परमात्मा, ईश्वर, खुदा, गौड इत्यादि नामों से पुकारा जाता है।
इस पुस्तक में सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। पुस्तक में लिखा गया है कि पिछले सैकड़ों सालों में हजारों वैज्ञानिकों ने पूरे ब्रह्माण्ड में बहुत खोज की है तथा प्रकृति के रहस्यों को खोजने के लिये अनवरत प्रयत्न किये। विज्ञान यह तो मानता है कि मनुष्य तथा दूसरे हर जीवित प्राणी में चेतना है परन्तु मृत्यु के पश्चात् मनुष्य की आत्मा नष्ट नहीं होती तथा वह अजर-अमर है, इस बात को वैज्ञानिक अभी मानने को तैयार नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने सारे ब्रह्माण्ड को छान मारा है परन्तु उन्हें अभी तक ऐसे देवलोक, शिवलोक इत्यादि सारे ब्रह्माण्ड में नहीं मिले जहाँ देवताओं का वास हो तथा जहाँ पर मनुष्य की मृत्यु के पश्चात् उसकी अजर-अमर कही जाने वाली आत्मा जाती हो।
इस पुस्तक को बार बार पढ़ने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि श्री शारदाजी ने माँ का वर्षों तक चिन्तन करके अपने ज्ञान से जो आध्यात्मिक विचार लिखे हैं वे सत्य हैं। जो मनुष्य आध्यात्मिक विचारधाराओं पर विश्वास करते हैं उनके ज्ञानवर्धन के लिये यह पुस्तक बहुत उपयोगी है। उनको यह पुस्तक पढ़नी चाहिये। मुझे यह पुस्तक बहुत अच्छी लगी।
“दर्शन शास्त्र और विज्ञान का जो समन्वय किया गया है, वह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग है।”
प्रकृति के रहस्यों को जानने की इच्छा सदैव मानव में रही है। यह सत्य है कि ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्यों को केवल दिव्य साधना द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। यह भाषा से परे होते हैं। अतः शब्दों द्वारा इन्हें पूर्णतया समझना असम्भव है। मानव जाति के लाभार्थ इन दिव्य अनुभवों को भाषा में, जहाँ तक सम्भव हो, समझाने का प्रयास महापुरुष सदैव करते आये हैं। इसी कठिन कार्य में श्रद्धेय श्री नन्दकिशोर जी शारदा द्वारा लिखित पुस्तक "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार" को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिये।
श्री शारदा ने विज्ञान-सम्मत सरल तर्कों द्वारा दिव्य अनुभूति को समझाने का जो प्रयास किया है, यही इस पुस्तक की विशेषता है। दर्शन शास्त्र और विज्ञान का जो समन्वय किया गया है, वह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग है। यह पुस्तक न केवल प्रबुद्ध पाठकों की इस क्षेत्र में जिज्ञासा को शान्त करेगी, बल्कि उन्हें दिव्य साधना के लिये प्रेरित भी करेगी।
“अध्यात्म और विज्ञान पर आधारित यह खोजपूर्ण अनूठी पुस्तक आपका पथ भी आलोकित करे, कल्याण करे।”
माँ भगवती की कठोर साधना और सघन चिन्तन का प्रसाद भैया नन्दकिशोर शारदाजी ने "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार" के रूप में जन-जन के कल्याण के लिये परोसा है। पृथ्वी पर आये इस दैवीयदत्त ज्ञान को जो पात्र जितना समेट सकेगा उतने ही आनन्द से आनन्दित होगा और भैयाजी के ऊँकार ध्यान के "आनन्द घनम्, आनन्द घनम्" में डूबकर अनादिकाल के अनुत्तरित प्रश्न के समाधान का साक्षात्कार करेगा। अनुभूत दैवीय ब्रह्मज्ञान इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर और भवसागर से पार कराते हुए मृत्यु के बाद के उन अलौकिक दैवीय लोकों की उपस्थिति का ज्ञान और आवास का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिनका वर्णन हमारे अनेक धर्मग्रन्थों में मिलता है। आत्मतत्व विषयक इस महान सूक्ष्म ज्ञान को यम ने नचिकेता को कठोपनिषद में और ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मर्षि सप्त ऋषियों ने हमारे अनेक पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित किया है। इस आधुनिक भौतिक युग में त्रिभुवन माँ के इस लाड़ले ने भी सात अध्यायों में क्रमशः भौतिक शरीर की माँ के मणिद्वीप तक की यात्रा का वृतान्त सहज तर्कों, वैज्ञानिक अवधारणाओं और अपनी अनुभूतियों के आधार पर दिया है। भैयाजी के पिता की मृत्यु के बाद उनके मन में उठे प्रश्नों के उत्तर ही इस अनूठी खोजपूर्ण पुस्तक में समाहित हैं। जिसके बाद कोई अनादि प्रश्न अनुत्तरित नहीं रह जाता, ब्रह्मज्ञान उदय हो जाता है, आवरण हट जाते हैं। "सत्य धर्माय दृष्टये" सत्य धर्म का दर्शन हो जाता है। चैतन्यता ही चैतन्यता सर्वव्यापी है।
सत्य धर्म के दर्शन माँ काली के साक्षात्कार के रूप में रामकृष्ण और विवेकानन्द की साधना के फल थे तो भैयाजी की साधना माँ भगवती के साक्षात्कार के रूप में फलीभूत हुई। माँ के दर्शन और कृपा से इन्हें चैतन्य जगत के दर्शन और माँ के लोकों की शरण मिली। रामकृष्ण और विवेकानन्द साहित्य को आत्मसात कर भैयाजी भी वैसी ही सत् चित्त आनन्द अवस्था में विहार करते हुए सभी के प्रति समभाव, करुणाभाव और मैत्रीभाव से ओतप्रोत व्यवहार करते देखे जाते रहे। धर्म का लक्षण सेवा में प्रस्फुटित होता है, जो "श्री नन्दकिशोर शारदा ज्ञान गंगा मिशन", "स्वामी विवेकानन्द स्टुडेन्ट्स वेलफेयर चेरिटेबल ट्रस्ट" एवं माँ शारदा मणि ट्रस्ट समाज को इस अमृतमय ज्ञान और भगवती स्वरूपा निर्धन छात्राओं की सेवा के रूप में बांट रहे हैं।
मणिद्वीप परिवार के सभी साधक-साधिकाएँ अपने आत्मदीप को नन्दू दीप से प्रज्ज्वलित कर त्रिभुवन सुन्दरी, द्वारा भैया के आलोकित किये पथ पर ही चल रहे हैं। इस आत्मशुद्धि सेवा और परमार्थ के पथ पर जो चलता है, माँ के लोक 'मणिद्वीप' में ही पहुँचता, चिरविश्राम पाता है। उसका कल्याण ही कल्याण, मंगल ही मंगल होता है। अध्यात्म और विज्ञान पर आधारित यह खोजपूर्ण अनूठी पुस्तक आपका पथ भी आलोकित करे, कल्याण करे।